सोमवार, 22 सितंबर 2008

ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से


मेरे घर के दाहिने एक वकील रहते हैं, जो खाने-पीने में अच्छे हैं, दोस्तों को भी खूब खिलाते हैं और सभा-सोसाइटियों में भी काफी भाग लेते हैं. बाल-बच्चों से भरा-पूरा परिवार, नौकर भी सुख देने वाले और पत्नी भी अंत्यंत म्रगुभाषिनी. भला एक सुखी मनुष्य को और भी क्या चाहिए?


मगर वे सुखी नहीं हैं. उनके बीतर कौन-सा दाह है, इसे मैं भली-भाँती जानता हूँ. दरअसल उनकी बगल में जो बीमा एजेंट हैं, उनके बैभव की ब्रद्धि से वकील साहब का कलेजा जलता रहता है. वकील साहब को भगवान् ने जो कुछ दे रखा है, वह उनके लिए काफ़ी नहीं दीखता. वे इस चिंता में भुने जा रहे हैं कि काश, एजेंट की मोटर, उसकी मासिक आय और उसकी तड़क-भड़क मेरी भी हुई होती.


इर्ष्या का यही अनोखा वरदान है. जिस मनुष्य के ह्रदय में इर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनंद नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वास्तोयों से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास है. वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके ह्रदय पर दंश मारते रहते हैं. दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है. मगर, ईर्ष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या? आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी ही पड़ती है.


एक उपवन को पाकर भगवान् को धन्यवाद देते हुए उसका आनंद नहीं लेटना और बराबर इस चिंता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला, एक येसा दोष है, जिससे ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है. अपने अभाव पर दिन-रात सोचते-सोचते वह स्रष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है और अपनी उन्नति के लिए उद्धम करना छोड़कर वह दूसरों को हानि पहुंचाने को ही अपना श्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है.


इर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निंदा है. जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निंदक भी होता है. दूसरों की निंदा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार, दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आंखों से गिर जायेंगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अन्यायास ही बैठा दिया जाऊंगा.


मगर येसा न आज तक हुआ है और न होगा. दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती. एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निंदा से नहीं मरता. उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है. इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निंदा करने से अपन्मी उन्नति नहीं कर सकता. उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाए तथा अपने गुणों का विकास करे.


ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके ह्रदय में उसका जन्म होता है. आप भी येसे बहुत-से लोगों को जानते होंगे, जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर इस फ़िक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनाने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले. श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजाने लगता है और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व-कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो. अगर ज़रा उनके अपने इतिहास को देखिये और समझने की कोशिश कीजिये कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बड़े हैं या पीछे हटे हैं. यह भी कि वे निंदा करने में समय व शक्ती का अपव्यय नहीं करते तो आज उनका स्थान कहाँ होता?


चिंता को लोग चिता कहते हैं. जिसे किसी प्रचंड चिंता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिंदगी ही ख़राब हो जाती है, किंतु इर्ष्या शायद चिंता से भी बदतर चीज है; क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालती है.


म्रत्यु शायद फ़िर भी श्रेष्ठ है, बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को कुंठित बनाकर जीना पड़े. चिंतादाग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किंतु ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है.


ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष नहीं है. प्रत्युत इससे मनुष्य के आनंद में भी बढ़ा पढ़ती है. जब भी मनुष्य के ह्रदय में ईर्ष्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम सा दिखने लगता है. पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जता और फूल तो येसे हो जाते हैं, मानो वे देखने के योग्य ही नहीं हों.

आप कहेंगे कि निंदा के बाण अपने प्रतिद्वंदियों को बढ़कर हंसने में एक आनंद है और यह आनंद ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है. मगर, यह हंसी मनुष्य की नहीं, राक्षस की हंसी होती है और यह आनंद भी दैत्यों का आनंद होता है.


ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्विन्ड़ता से होता है, क्योंकि भिन्खमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता. यह एक

एसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है; क्योंकि प्रतिद्विन्दाता से मनुष्य का विकास होता है, किंतु अगर आप संसार्व्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेंगे. मगर याद रखिये कि नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीज़र सिकंदर से तथा सिकंदर हरकुलिस से.


ईर्ष्या का एक पक्ष, सचमुच ही लाभदायक हो सकता है. जिसके अधीन हर आदमी, हर जाती और हर दल अपन को अपने प्रतिद्वंदी का समकक्ष बनाना चाहता है, किंतु यह तभी सम्भव है, जब कि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो.


अक्सर तो येसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है, जो उसकी भीतर नहीं है, कोई वास्तु है, जो दूसरों के पास है, किंतु वह यह नहीं समझ पता कि इस वास्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है, जबकि ये लोग भी अपने आपसे शायद वैसे ही असंतुष्ट हों.


आपने यही देखा होगा कि शरीफ लोग यह सोचते हुए अपना सर खुजलाया करते हैं कि फलां आदमी मुझसे जलता है, मैंने तो उसका कुछ नहीं बिगाडा और अमुक व्यक्ति इस कदर निंदा में क्यों लगा हुआ है? सच तो यह है कि मैंने सबसे अधिक भलाई उसकी की है.


यह सोचते हैं-मैं तो पाक-साफ़ हूँ, मुझमें किसी व्यक्ति के लिए दुर्भावना नहीं है, बल्कि अपने दुश्मनों की भी भलाई ही सोचा करता हूँ. फ़िर ये लोग मेरे पीछे क्यों पड़े हुए हैं? मुझमें कौन-सा वह एब है, जिसे दूर करके मैं इन दोस्तों को चुप कर सकता हूँ.?


ईश्वरचंद्र विद्यासागर जब इस तजुरबे से होकर गुजरे, तब उन्होंने एक सूत्र कहा- "तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है."


और नीत्से जब इस कूचे से होकर निकला, तब उसने जोरों का एक ठहाका लगाया और कहा कि "यार, ये तो बाजार की मक्खियाँ हैं, जो आकरण हमारे चारों ओर भिभिनाया करती हैं."


ये सामने प्रशंसा और पीठ पीछे निंदा किया करते हैं. हम इनके दिमाग में बैठे हुए हैं, ये मक्खियाँ हमें भूल नहीं सकती और चूँकि ये हामारे बारे में सोचा करती हैं, इसलिए ये हमसे डरती हैं और हम पर शंका भी करती हैं.


ये मक्खियाँ हमें सजा देती हैं हमारे गुणों के लिए. ये एब को तो माफ़ कर देंगी, क्योंकि बड़ों के एब को माफ़ करने में भी शान है, जिस शान का स्वाद लेने के लिए ये मक्खियाँ तरस रही हैं.

जिनका चरित्र उन्नत है, जिनका ह्रदय निर्मल और विशाल है, वे कहते हैं-" इन बेचारों की बातों से क्या चिड़ना? ये तो ख़ुद ही छोटे हैं."


मगर जिनका दिल छोटा है और द्रष्टि संकीर्ण है, वे मानते हैं कि जितनी भी हस्तियाँ हैं, उनकी निंदा ठीक है और जब हम प्रीती, उदारता और भलमनसाहत का बरताव करते हैं, तब भी वे यही समझते हैं कि हम उनसे घ्रणा कर रहे हैं और हम चाहे उनका जितना उपकार करें, बदले में हमें अपकार ही मिलेगा.

दरअसल, हम जो उनकी निंदा का जवाब न देकर चुप्पी साधे रहते हैं, उसे भी वे हमारा अंहकार समझते हैं. खुशी तो उन्हें तब होती सकती है, जब हम उनके धरातल पर उतरकर उनके छोटेपन के भागीदार बन जाएँ.


सारे अनुभवों को निचोड़कर नीत्से ने एक दूसरा सूत्र कहा, "आदमी में जो गुण महान समझे जाते हैं, उन्हीं के चलते लोग उससे जलते भी हैं."


तो ईर्ष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है? नीत्से कहता है कि "बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकांत की ओर भागो. जो कुछ भी अमर तथा महान है, उसकी रचना और निर्माण तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है. जो लोग नए मूल्यों का निर्माण करने वाले होते हैं, वे बाजारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास भी नहीं रहते." जहाँ बाजार की मक्खियाँ नहीं भिनकती, वहाँ एकांत है.


यह तो हुआ ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपया, ईर्ष्या से आदमी कैसे बच सकता है?


ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है. जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वाभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चैये. उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है. जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएय्गी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।

  • रामधारी सिंह दिनकर का एक आलेख

1 टिप्पणियाँ:

lakhan lal 16 फ़रवरी 2013 को 1:19 am  

हरिशंकर पारसी की ये कृति है

  © Blogger template 'Solitude' by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP