मंगलवार, 23 सितंबर 2008

चिंगारी चमकती रहे

(करमबीर पवार उल्टा तीर परिवार का महतवपूर्ण हिस्सा हैं हमें सतत रूप से उनका मार्गदर्शन एवं स्नेह मिलता रहता है दिनकर जन्म शती वर्ष और हिन्दी दिवस के सामायिक सन्दर्भ पर उनका चिंतन हमें सोचने पर मजबूर करता है)

अमित जी हिन्दी दिवस और रामधारी सिंह दिनकर जी का जनमशती वर्ष बहुत बहुत मुबारक हो सबसे पहले मैं हिन्दी दिवस के विषय मे कुछ बताना चाहूँगा आख़िर क्यों हिन्दी दिवस मनाये हम, हम तो जीवन भर हिन्दी ही बोलते है और हिन्दी हिन्दुस्तान की मात्रभाषा है तो क्यों हम हिन्दी को बोलते वक्त शर्म महसूस करे आज भी हिन्दी भाषाई लोग किसी अन्य भाषी की अपेक्षा जल्दी ही दुसरे के दुःख में सामिल हो जाता है ये केवल भाषा ही नही बल्कि एक परम्परा है जिसको ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है अन्य भाषाई लोगो के द्वारा विशषकर अंग्रेजी भाषा के समर्थको के द्वारा रामधारी जी ने कहा था:-

कलमें लगाना जानते हो तो जरूर लगाओ ,
मगर ऐसे कि फलो मे
अपनी मिटटी का स्वाद रहे
और यह बात याद रहे कि परम्परा चीनी नही ,मधु है
वह न तो हिंदू है न मुस्लिम है
न द्रविड़ है न आर्य है

इसका अर्थ केवल इतना ही है कि यदि आपको विदेशी परम्परा और सभ्यता का ही पालन करना है तो जरूर करो लकिन इतना ध्यान जरूर रखो कि तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यो के परिणाम भारतीय परम्पराओ व सभ्यता के अनुरूप ही होने चाहिए । हमारे देश के कुछ सवार्थी नेताओ के द्वारा आज़ादी से पहले ही अंग्रेजी को अपने लिए अंग्रेजो के विस्वास पात्र बनने का हथियार बना लिया था जो आज़ादी के साठ साल बाद भी कामयाब है अब वो लोग भारत के नए भाग्य विधाता बन बेटे है आम भारतीय आज भी गुलाम है हिन्दी भाषा कि तरह जिसे केवल कुछ मौको पर ही अपने साथ बेठा लिया जाता है केवल इस डर से कि कंही दुबारा वह आज़ादी जो अधूरी ही है को पूर्ण आज़ादी मे बदलने का परयाश न करे लकिन कभी तो हर हिन्दुस्तानी इस सचाई को जानेगा और तब हमे पुरी आज़ादी लेने से कोई नही रोक पायेगा बल्कि पुरे विश्व मे हिन्दी का परचम लहराने लगेगा

रामधारी जी के विषय मे शायद कुछ भी लिखना मेरे लिए बहुत ही मुस्किल है फ़िर भी उनका नाम ही उनके व्यक्तिव को उजागर करता है "रामधारी" जिसने राम को ही धारण कर लिया हो "सिंह "जो शेर के सामान किसी से भी भयभीत न होता हो "दिनकर"और जिसके आते ही सूर्ये के सामान प्रकाश चारो और फ़ैल जाता हो ऐसे लेखक को पड़ने वालो के अन्दर भी उस प्रकाश का कुछ अंश तो जरूर होगा ही इस लिए मे भी इस प्रयासः मे रहता हूँ कि जीवन मे अपने देश के लिए और समाज के उस हर वर्ग को होसला देने का प्रयाश करूगा जो दिनकर के दिखाए पथ पर चलने का प्रयासः भी करेगा क्युकि वह हर वर्ग को संघर्ष कि प्रेरणा देता है और कमज़ोर कि आवाज़ बन ताकतवर को भी सुनाई देता है रामधारी जी को भारतीयों ने राष्ट्कवि का सम्मान दिया जिस प्रकार गाँधी जी को राष्टपिता का इससे यह भी पता चलता है की रामधारी जी की कलम के सभी वर्ग सम्मान करते थे अंत मे सिर्फ़ इतना-
चिंगारी चमकती रहे सदा उज्जवल होकर
आदमी बचाए उसे सर्वस्व खोकर...
(आलेख : करमबीर पंवार)

1 टिप्पणियाँ:

jaswanti 25 अक्तूबर 2008 को 8:36 am  

आपने बहुत ही सुंदर तरीके से लिखा है हिन्दी केवल देश प्रेम की निशानी नही है बल्कि एक जीवन पद्धति है जो भी देश अपने लोगो को मार्तभाषा मे शिक्षा देता है वह कभी भी दुनिया से पिछडे नही सकता

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