सोमवार, 22 सितंबर 2008

सत्य ने बचाए प्राण (एक कहानी )


करीबन एक हज़ार साल पहले शेख अब्दुल कादिर अल-जिलानी नाम के एक भरी संत पैदा हुए थे. जब वे केवल ८ वर्ष के थे, उन्होंने एक दिन एक गाय को यह कहते हुए सूना, "चारागाह के मैदान में यहाँ तुम क्या कर रहे हो? इसके लिए तुम्हें नहीं बनाया गया है." वह डरकर तुंरत दौड़ता हुआ अपने घर चला गया और अपने घर की छत पर चढ़ गया. वहां से उन्होंने देखा कि भरी संख्या में लोग हजारों मील दूर मक्का के पास अरफात पहाड़ से हज करके लौट रहे हैं।


अब्दुल क़ादिर के मन में जिज्ञासा पैदा हो गई. वह माँ के पास गया और बग़दाद जाकर ज्ञान की खोज करने की स्वीकृति मांगी. उसकी माँ ने भगवान् का आदेश सुना और तुंरत स्वीकृति दे दी. उसने उसे सोने के ४० सिक्के भी दिए जो पिटा के दाय से प्राप्त उसका हिस्सा था. माँ ने उन सिक्कों को उसके कोट के अन्दर सी दिया. उसने बेटे को बिदा करते समय कहा, " ओ मेरे बेटे! तुम जा रहे हो. मैंने अल्लाह के लिए अपने को तुम्हारे मोह से मुक्त कर लिया है क्योंकि मैं जानती हूँ कि क़यामत के दिन तक मैं तुम्हारा मुखडा फ़िर नहीं देख पाउंगी. लेकिन अपनी माँ से एक सलाह लेते जा. भले ही प्राण चले जाएँ, तब भी तुम्हें हमेशा सत्य को ही महसूस करना चाहिए, सत्य वचन ही बोलना चाहिए और सत्य का ही प्रचार करना चाहिए."


अब्दुल क़ादिर बग़दाद जाने वाले एक कारवां के साथ यात्रा पर चल पड़ा. मार्ग में एक बीहड़ मैदान पार करते समय कारवां पर कुछ घुड़सवार डाकुओं ने हमला कर दिया और मुसाफिरों को वे लुटाने लगे. किसी ने अब्दुल क़ादिर की और ध्यान नहीं दिया. आख़िर एक डाकू ने उसे देखकर कहा, "तुम एक गरीब भिखारी लगते हो. फ़िर भी, क्या तुम्हारे पास कुछ माल है?"


"मेरे पास ४० अशर्फियाँ हैं जिन्हें मेरी माँ ने मेरे कोट के अस्तर में कांख के नीचे सी कर रख दी हैं."

डाकू ने मुस्कराते हुए सोचा कि यह लड़का मज़ाक कर रहा है. वह उसे छोड़कर चला गया. दुसरे डाकू ने आकर उससे वही सवाल पूछा. अब्दुल क़ादिर को जवाब वही था. उसने भी बालक की बात पर विश्वाश नहीं किया और चला गया. कुछ एनी डाकू उसे सरदार के पास ले गए और बोले, "यह लड़का देखने में भिखारी लगता है मगर कहता है कि इसके पास ४० अशर्फियाँ हैं. हमलोगों ने सबको लूट लिया है, किंतु इसे नहीं छुआ है, क्योंकि इसकी बात पर हमें विश्वाश ही नहीं हुआ. हो सकता है यह हमें बेवकूफ बनाके की कोशिश कर रहा हो."


सरदार ने भी अब्दुल कादिर से वही सवाल पूछा और अब्दुल कादिर ने भी वही उत्तर दिया. सरदार ने तब उसके कोट को चीरकर देखा. उसमें सचमुच सोने के ४० सिक्के थे.


सरदार ने चकित होकर बालक से पूछा कि उसने क्यों कबूल किया कि उसके पास सोने के सिक्के हैं. अब्दुल कादिर कहा, "मेरी माँ ने हमसे वादा लिया था कि मैं हमेशा प्राण जाने पर भी सत्य का ही पालन करूंगा. यह तो केवल चंद सिक्कों की बात थी. मैंने उसे वादा किया था कि मैं कभी भी आजीवन उसके विश्वाश को नहीं तोडूंगा. इसलिए मैंने सच बता दिया."


सरदार की आंखों में आँसू छलक पड़े. उसने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, "तुमने अपनी महान माता की सलाह का द्रड़ता से पालन किया है, जबकि हम सब अपने माता-पिटा के विश्वाश और अल्लाह के वचन को कितने सालों से तोड़ते आ रहे हैं. अब से हमारे प्रायश्चित में तुम हमारे पुरोधा रहोगे." सभी डाकुओं मां चोरी छोड़ने का निश्चय किया और उस दिन से वे नेक और धर्म परायण हो गए.


यहाँ संसार मां एक माँ के दिए हुए सत्य से एक महान संत शेख अब्दुल कादिर अल-जिलानी को जन्म लेते हुए देखा।


1 टिप्पणियाँ:

karmowala 22 अक्तूबर 2008 को 9:48 am  

बहुत -बहुत अच्छी कहानी है ऐसे ही विचारो वाली कहानी हमे लिखनी और अपने बच्चो को सुनानी चाहिये

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