मंगलवार, 23 सितंबर 2008

हिन्दी भाषा के मर्मज्ञ रामधारी सिंह दिनकर

(प्रेम परिहार अपनी साहित्यिक सक्रियता के लिए चिर परिचित हैउनकी संस्था द्वरा दिनकर जन्म शती वर्ष में विविध आयोजन किए गएरामधारी सिंह दिनकर के कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रेम परिहार का यह आलेख राष्ट्र कवि दिनकर को श्रद्धा सुमन हैं)

दिनकर तुम दिनकर हिन्दी के, भारत के माथे की बिंदी.
मात्रभाषा के प्रबल साराथी, 'प्रेम' धन्य ध्वजा फहराए हिन्दी।


दिनकर किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है,दिनकर किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है. हिन्दी साहित्य की काव्य धारा के एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उनकी प्रतिभा हमेशा ही जाग्रत रही है. दिनकर को पढ़ना हिन्दी के अन्तर को अपनी चेतना में जाग्रत करना है. विगत वर्ष २००७ में हमने हरवंश राय बच्चन जन्म-शताब्दी का समापन एवं इसके साथ ही दूसरे दिन से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्म्षता ही समारोह की आयोजनों की शुरूआत की. आर्य समाज सभागार ग्रीन पार्क नई दिल्ली से प्रारम्भ हुई यह यात्रा अपने विभिन्न आयौजन को पूरी करते हुए पुनः नई दिल्ली बसंत कुञ्ज सामुदायिक भवन में समापन की ओर बढ़ रही है. रास्ट्रीय स्तर पर विगत २८ वर्षों से रास्ट्रीय साहित्य, संगीत एवं नाटक, छायांकन, पर्यावरण एवं मीडिया की विभिन्न विभागों को स्थानीय स्तर से रास्ट्रीय स्तर एवं अंतरास्तीय स्तर पर पहुंचकर एक मिशाल कायम की. संस्कृति के चार अध्याय एक समग्र दिनकर चिंतन को रेखांकित करता है. रश्मिरथी में रामधारी सिंह दिनकर ने सजीवता का परिचय दिया है.

ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरुस्कृत राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने साहित्य के आकाश में अपनी विशेष उपस्तिथि प्राप्त की. बचपन से लेकर अन्तिम पढाव तक दिनकर आकाश के सूर्य की तरह चमकते रहे और कभी मेघाच्छारित होने से छिप भी गए.
मन के अन्दर की व्यथा को शब्दों में चित्रित कर पाना आसान नहीं होता. मैंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जन्म-स्ताब्धी समारोह के अंतर्ग अनेक प्रदेशों में उनके सम्बन्ध में सूना समझा और पढ़ा तो एक इन्द्रधनुष जैसी रंगीन घटा उभरकर मानस में विभिन्न रंगों को परिभाषित करती हुई प्रतीत हुई. हारे को हरिनाम उनकी कृतियों में अलग स्थान रखती है. विभिन्न विधाओं में शब्दों के चितेरे अपना सर्वस्व चिंतन जन मानस के समझ प्रस्तुत किया है. जीवन विभिन्न चरणों से होकर गुज़रता है इन सबमें मन की परिस्तिथियाँ बदलती रहती हैं. मनुष्य अपनी बात अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तरह से व्यक्त करता है. एक विचार पाठकों के साथ बाँट लेना उचित समझता हूँ. पूर्व की कहावत है: 'जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि'
कवि की रंगभूमि कविता होती है और अपने मानस की अभिव्यक्ति वह शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करता है. मुझे लगता है कि कवि के अनुभव उसे सार्थक दशा दिशा और संभावनाएं प्रदान करते हैं. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर सूर्य के सामान प्रकाशित कवि के समान परिभाषित और अनुभ के सार्थक दिशा के राही एवं लक्ष्य के साधक रहे हैं और हम अगली पीढी के पथिकों को उनकी रचनाओं पर मात्र जनस्ती पर ही नहीं हमेशा ही संवाद करना चाहिए.
(प्रेम परिहार। सी पी सी दूरदर्शन दिल्ली)

1 टिप्पणियाँ:

karmowala 4 अक्तूबर 2008 को 9:30 am  

प्रेम जी तो वास्तव मे हिन्दी साहित्य से गहरा लगाव रखते है इसलिए अक्सर उनके पास इस तरह की जानकारी होती ही है लकिन उनका अपना ज्ञान हम सब के साथ बाटना सराहनीय है इसके लिए उन्हें मे अपनी और उल्टा तीर दोनों की तरफ़ से धन्यवाद् देना चाहुगा

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