रविवार, 3 अगस्त 2008

मुक्तक


मुक्तक
(डॉ उदय 'मणि ' कौशिक)

"मुक्तक "

हमारी कोशिशें हैं इस, अंधेरे को मिटाने की
हमारी
कोशिशें हैं इस, धरा को जगमगाने की
हमारी
आँख ने काफी, बड़ा सा ख्वाब देखा है
हमारी
कोशिशें हैं इक, नया सूरज उगाने की ...

चाहता हूँ ...
एक ताजी गंध भर दूँ
इन हवाओं में...

तोड़ लूँ
इस आम्र वन के
ये अनूठे बौर
पके महुए
आज मुट्ठी में
भरूं कुछ और
दूँ सुना
कोई सुवासित श्लोक फ़िर
मन की सभाओं में

आज प्राणों में उतारूँ
एक उजला गीत
भावनाओं में बिखेरूं
चित्रमय संगीत
खिलखिलाते फूल वाले

छंद भर दूँ
मृत हवाओं में ...


डॉ उदय 'मणि ' कौशिक जी सम्प्रति 'कोटा' राजस्थान में रहते हैं.
ब्लॉग: http://mainsamayhun.blobspot.com


1 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली 3 अगस्त 2008 को 10:28 am  

बढि़या मुक्तक है।

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