मंगलवार, 27 जनवरी 2009

युवा प्रवृति और आतंकवाद

बिहार से
[
कंचन कुमार]

मनुष्य स्वभावत: ‘शान्ति प्रिय प्राणी है। फिर वे कौन से कारण हैं, जो मानव को ‘शान्ति विरोधी आतंकवादी बना देता है। इसके जवाब खोजे तो अलग-अलग विशेषज्ञों के अलग-अलग मत होंगे। मनोविज्ञान की द्रष्टि से मानव जब अपनी क्षमताओं का सही सदुपयोग नहीं करता तो वे अपनी ‘ाक्ति गलत दि’ाा में नियोजित करने लगता है। जिसका उदे’य अपने मन अनुसार स्वरूप पैदा करना होता है। ऐसा करने वाले व्यक्ति के निजी या किसी खास संस्था के स्वार्थ होता है। जिसमें सार्वभौमिक दृ”िट का अभाव होता है।

जिस तरह से अहमबाद, जयपुर, लखनÅ, बनारस, दिल्ली और बम्बई जैसे ‘ाहरों पर आतंकवाद का नंगा नाच दिखने को मिला। इसे देखकर मानवता की तबाही ही कहा जायेगा। इसमें कोई ‘ाक नहीं कि आज बढ़ते आतंकवाद की घटना के बाद, ‘ाासक, प्र’ाासन, और समाज में आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ लोहा लेने का भाव बढ़ा है। लेकिन दिन प्रति दिन आतंकवाद अपने स्वरूप बदल-बदल कर सामने आने लगे है। तब यह सवाल है कि आतंकवाद क्यांे, कहां, कब, कैसे और किसके द्वारा बढ़ता पनपता है। अगर हम आतंकवादी बनने वाले व्यक्ति और संगठन के कारणों पर नजर डाले, तब जाकर आतंकवाद के मूल में हम पहुँच सकते है।

आतंकवाद का ‘ाुरूआती कदम दह’ात, भय और क्रोध से होता है। इसका जन्म परिवार, समाज, रा”ट्र और संसार में अपने को श्रे”ठ या ‘ाक्ति’ााली दिखाने की चाहत से होती है। इसका एक पहलू यह है कि जब व्यक्ति या समाज भावना और संवेदना हीन हो जाता है। तब दह’ात, भय, क्रोध और रक्त-रंजि’ा का सहारा लेता है। कोई व्यक्ति या संगठन, समाज के सामने अपनी पहचान बनाने या बढ़ाने में असफल होते हैं, तब हिंसा, भ्र”टाचार, चरित्रविहीन और अमानवीय रास्तों का सहारा लेता हैं।

जब से दे’ा आध्यात्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक दृ”िट से वि’व मंच पर अपना स्थान बनाया है, तब से दे’ा के अन्दर और बाहर के कई संगठन अपने को विफल और अनदेखा महसुस करने लगे है। और समाज के सामने अपनी उपस्थिती और ‘ाक्ति’ााली स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए हिंसक और अमानवीय कदम उठाने लगे है। ऐसे कदम उठाने वाले खुद को किसी संगठन से जोड़कर अपने कार्यों को अंजाम देते है। लेकिन उनके निजी स्वार्थ की अधिकता के कारण समाज के भाव-संवेदनहीन व्यक्तियों को किसी प्रकार जोड़ते है या जुड़ने के लिए मजबूर कर पाते हैं।

आज तक के पकड़े गये आतंकवादियों के मनोविज्ञान से पता लगता है कि अपने भावना और संवेदना को न प्रकट करने के कारण ही व्यक्ति प’ाुवृत्ति जैसे कार्य को अंजाम देने के लिए तैयार होतें है। आतंकवाद के अतीत से अब तक की खोज से पता लगता है, न के बराबर ही कवि, साहित्यकार, संगीतकार, गीतकार या कलाप्रेमी आतंकवादी थे। इससे पु”िट होती है कि संवेदना और भावना का प्रकट करने का स’ाक्त माध्यम कला है। कला जो इंसान में करूणा, दया के साथ भाव-संवेदना की गंगोत्री निरंतर प्रवाहित करने में मददकार होती है।

प्राचीन से अब तक के कला प्रेम के अलग-अलग कलायोंे से यहीं लगता है, जब मनु”य में अन्दर का मन बिखराव के अनुसार अपनी अलग-अलग कला का जन्म देते है। मन वेदना से ग्रस्त व्यक्ति गिटार बजाकर, गीत गाकर, साहित्य रच कर, चित्र बनाकर अपने अन्दर का भाव प्रकट करने वाला व्यक्ति कभी आतंकवाद जैसा रास्ता नहीं अपना सकता। एक समय था हमारी ’िाक्षा में कला का एक जरूरी अंग माना जाता था। आज की बजारू ’िाक्षा ने इंसान में इंसानियत जिन्दा रखने वाले विधा को लुप्त कर दिया। यही से मानव से मानवता का पतन होने के सिलसिले में तेजी आयी।

अत: आज आतंकवाद से मुक्त समाज बनाने के लिए जीवन साधना की जरूरत है। इसके लिए व्यक्ति की प्रकृति, स्वभाव और रूचि के अनुसार कला चयन करनी की आव’यकता है। इसके माध्यम परिवार, समाज और गुरूजन हो सकते है। जो बाल अवस्था मंे मन भाव को पढ़कर उसके रूचिनुसार कला बढ़ाने में सहयोग दे। आगे चलकर कलायुक्त बालक ही करूणा, दया और मानवहितकारी नागरिक बन सकंेगा। तभी आतंकमुक्ति समाज और रा”ट्र का निर्माण होगा। जब तक कुंठित और मनोरोगी से पीड़ीत व्यक्ति समाज में रहेंगे तब तक आतंवादमुक्ति रा”ट्र नहीं हो सकता है। आज से हम सब जाति, क्षेत्र, भा”ाा और संप्रदाय भाव से Åपर उठकर इसमें अपना सहयोग दे। जहां कहीं भी मन के हारे व्यक्ति दिखे उसे सहयोग और सद्भाव से आगे बढायें।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
-मेल: krkanchan@gmail.com
मोबाइल- +९१-९६५०३ 41235

1 टिप्पणियाँ:

karmowala 14 फ़रवरी 2009 को 7:34 am  

कंचन कुमार का लेख पड़ा काफी अच्छा लिखा है लेकिन लिखने मे असावधानी बरती गई है जिसे सुंदर विचार कुछ अस्पष्ट हो जाते है कृपया इसका ख्याल रखे

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