मंगलवार, 27 जनवरी 2009

एक सोच आतंकवाद पर

[बबिता पंवार]

आज हम जब भी आतंकवाद की बात करते है तो उसे इस्लामी आतंकवाद से जोड़कर देखते है या फ़िर हम उसे
आतंकवाद कहते है जिसे हमारे राजनेता आतंकवाद कहते है आज भी रास्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने इस और इशारा किया है की हमारा पडोशी देश आतंकवाद को शय दे रहा है लकिन वो ये सब जान कर भी कुछ नही कर सकते क्युकी उनको अपनी जनता यानि हम सभी भारतीयों पर यकीन नही है की कल अगर कोई सरकार युद्ध जितना बडा फ़ैसला ले तो भी क्या जनता साथ देगी और यदि देगी भी तो युद्ध की विभीषिका तो सभी जानते है की हर तरफ वीराने ही होंगे तो क्या है आतंकवाद का हल और क्या है आतंकवाद।

इस पर दुबारा गहन रूप से सोचना होगा क्युकी यदि हम सवयम से डरे हुए है तो क्या कभी इस आतंक से मुक्त हो सकते है नही कभी नही पहले हमे यह निश्चय करना होगा की हम आतकवाद को ख़त्म करने के लिए क्या बलिदान कर सकते है और उसके बाद ही इस आतंकवाद को जो हमे और किसी से नही बल्कि अपनी ही गलतियों की सज़ा भुगतनी होगी क्युकी आज हम सबसे पहले पकिस्तान पर उगली उठाते है जो कही बहार से नही आए बल्कि भारत के दुकडे कर बना है और वो हमसे उस बात का बदला ले रहे है की आख़िर क्यों कुछ नेता हम सब के कर्ता- दर्ता है क्यों नही जर्मनी की तरह भारत एक हो सकता।

आपको मालूम नही है या जानकर भी अनजान बने रहते हो .भारत का विभाजन बिर्टेन के देन है और हर ताकतवर देश (अमेरिका ) ये चाहता है की उसका गुलाम कभी भी आजाद न हो आम नागरिक जो आराम से रहेगा तो ताकतवर लोगो को कौन पूछेगा ये सब हक की लडाई है जब तक दुनिया मई गरीबी होगी ये ज़ंग नए - नए नाम से होती रहेगी।

शायद मै गलत हूँ लकिन क्या ये कारण काफी नही मेरी इस बात के सहमती के लिए
जय करो गरीबो के नाथ की जय करो हिन्दुस्तान की।

लड़ें फ़िर अब

मुंबई से
[मुनव्वर सुल्ताना बदरुल हससन "सोनी हसोणी"]


इस दुनिया से हमने क्या पाया
ख़ुशी के बदले दर्द ही हाथ आया

हिंदू-मुस्लिम कहते थे भाई-भाई
आज इन्होने ही भाई का दिया बुझा डाला

इन लोगों ने हर तरफ़ आंसुओं को बहाया
अपना कहकर अब पराया बनाया

दिल रो उठता है हर उस माँ का
जिनके बच्चों ने अपनों को मार डाला

या इलाही! दूर करदे हर उस बात को, नौजवानों से
जिसने उसे इंसान से हैवान बनाया

लडें फ़िर अब उस शान्ति की क्रांति को
जिसने पराये को भी अपना बनाया

आतंकवाद की समस्या और हम

[जसवंती पवार]

आतंकवाद आज विश्व भर की समस्या बन चुका है और इसलिए अब ताकतवर देश भी हमारी तकलीफ को कुछ समझ पा रहे है लकिन अपने शुद्र हित पूर्ति के कारण ही वो हमारे कहे पर विशवास नही कर रहे यदि कल किसी वीटो पॉवर देश पर इस तरह के हमले होते है तो वो तुंरत हमले का जवाब हमले से देगा लकिन हम तो भारतीय है हमे तो सत्य और अहिंसा का पाट याद है और न तो हमने आज़ादी ही लड़ कर प्राप्त की और नही हजारो साल के आक्रमणकारी इतिहास मै मिलजुलकर उसका जवाब दिया है तो आज कोई भी कैसे उस सरकार से उम्मीद कर सकता जो सदा लंगडी घोडी पर सवार रही है जिस पर बेठने वाला अपनी सलामती ही चाहता है चाहे कुछ भी हो
आज भारत देश को कोई नेता सुभाष,सरदार वल्लभ भाई,महाराणा ,या फ़िर किसी अवतार राम और कृष्ण की जरूरत है हमने बहुत कुछ पाया भी लकिन सम्मान के साथ नही केवल भीख के रूप मै और आज भी ताकतवर देश की तरफ़ ही देख रहे की हमारे ऊपर हुए आतंकवादी हमले के लिए वो इनके ख़िलाफ़ कार्यवाही करे आप ही सोचिये क्या कोई भी ऐशा करेगा कोई पराई आग मै अपने हाथ क्यो जलाए जब आतंकवाद के रहनुम्मा इतने ताकतवर है की अरबो की जनसँख्या वाला देश कुछ नही कर सकता तो वो क्या करे।

भाई अभी भी वक्त है जागो और देश का नेता ऐशा चुनो जो आप के मान -सम्मान के लिए अपनी जान भी न्योछावर कर दे।

इसे एक उदाहरण से समझो यदि आप और आपकी बीवी या फ़िर बेटी को कोई गुंडा उठा ले जाने का प्रयाश करे तो आप उस वक़्त किसी राहगीर की तलाश करोगे की भाई कल ये हादशा आपके साथ भी हो सकता
नही आप ऐशा कभी नही करेंगे और यदि आप का जवाब है तो फ़िर सब ठीक है।
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युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डॉं वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्"ा के क्षेत्र में 'दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्र"ास्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रका"ान रा'ट्रªीय एवं अंतर्रा'ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्"ा, स्त्री विमर्"ा, रा'ट्रभा'ाा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डॉं वीरेन्द्र ने वि"व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को "ाोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। रा'ट्रभा'ाा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व० श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डॉं० भीमराव अम्बेडकर फेलो"िाप सम्मान २००६, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान २००८ सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च "िाक्षा अध्ययन संस्थान रा'ट्रपति निवास, "िामला (हि०प्र०) में नई आार्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियॉं (२००८-११) विषय पर तीन वर्'ा के लिए एसोसियेट हैं।

हिन्दुस्तान का दर्द



[
संजय सेन सागर]


हिन्दुस्तान का दर्द वो बेदर्द नहीं समझेगे , जिन्हें आदत है खून बहाने की, जिनका मजहब ही नफरत है !!! अपनी कुसंगत भावनाओ को किसी के ऊपर थोपना ही आतंकवाद है लेकिन समय के साथ साथ इअका रूप भी बदल चुका है आज हिंसा की दम पर खून की नदिया बहाना की आतंकवाद का मोर्डेन रूप है।

भारत आतंकवाद से पीडित है ,जिस तरह से मुंबई मे खून का नंगा नाच खेला गया , बेगुनाहों को भूना गया उससे सारी जनता के दिल मे आतंकवाद के खिलाफ पल रही नफ़रत अब एक बेहद बड़ा रूप ले चुकी है !आज हर आदमी आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार से किसी कड़े और बड़े कदम की आशा कर रहा है शायद जनता का यह बड़ा कदम ''युद्ध'' है ! जी हां आज जनता चाहती है की अब हिन्दुस्तान और पकिस्तान की आखिरी लडाई हो , जिसमे कोई एक बचे और वो सुकून से रह सके !!
लेकिन युद्ध एक अभिशाप है और जब तक न हो तो ही अच्छा है क्यों की इसके बाद देश की विकास गति मंद पड़ जाती है और देश को अनेकों मुसीबतों का सामना करना पड़ता है !! और वैसे भी हम किस्से लड़ने की बात कर रहे है पकिस्तान से जबकि मेरे ख्याल से तो हमारी l

लडाई पकिस्तान से न होकर आतंकवाद से होनी चाहिए और युद्ध के बलबूते पर आतंकवाद का सफाया करने मे सक्षम नहीं हो सकते है इसलिए युद्ध सब्द का उपयोग करना भी देश को नुक्सान पहुँचाना है !
आतंकवाद के विरुद्ध और देश के भ्रष्ट राजनेताओं के विरुद्ध जिस तरह से जनता का रोष नजर आ रहा है उससे लगता है की जनता की यह ज़ंग एक मुकाम तक जरुर पहुँचेगी लेकिन इसकी भी एक शर्त है की जिस तरह का जोश और उत्साह जनता मे अभी है औए आखिरी समय तक कायम रहे जब तक की हम आतंकवाद और भ्रष्ट राजनीति को उखाड़ कर फेख़ न दे !
क्योंकि कभी कभी लगता है की जनता का यह रोष ,यह क्रोध उस गर्म दूध की भांति न हो जो पहेले तो गर्म होता है और बाहर निकलने का प्रयास करता है लेकिन जब उससे पानी निकल जाता है अतो उसका विरोध शांत पड़ जाता है और बह गाडा हो जाता है अर्थात माहोल के साथ समझोता कर लेता है

इससे यह आशय है की इस ज़ंग मे सिर्फ वे आगे बड़े जो जीतना चाहते है, जिनमे होसला है की वे बिपरीत हालातों मे भी खड़े रह सके मतलब सीधा है की यह ज़ंग राजनीति चमकाने के लिए नहीं है इसलिए सच्चे देश भक्त ही आगे आये , दिखावा करने वालों की लिए यहाँ कुछ नहीं है !!
बाहरी आतंकवाद से पहले हमारी लडाई खुद से होनी चाहिए हमें हमारी सरहदों के भीतर बिखरे आतंकवाद को कचरे के गड्डे मे दफनाना होगा , जिसे हम अपने स्वार्थी और भ्रष्ट नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ सकते क्योंकि इन पर न तो कभी आतंकवाद का खतरा आ सकता है न ही गरीबी का इन पर सिर्फ के जिम्मेदारी होती है कुर्सी बचाने की ! अगर बच गयी तो भगी बन जाते है न और किसी और को मिल गयी तो विरोधी बन जाते है ,इसी तरह की नोटंकी महारास्ट्र मुख्यमंत्री चुनाव मे नजर आई ! जिससे साफ़ हो गया की इन नेताओं की नजरों मे अब भी कुर्सी की कीमत उन सेकडों लाशों की आबरू से जयादा है !!
आज हम्हे जरुरत है की हम अपनी लडाई खुद लड़े क्योंकि युद्ध के बलबूते पर वो लडाई सेना से सेना की लडाई होगी जिसमे हमे हजारों , लाखों बेगुनहा सेनिकों को मौत के मुह मे धकेलना पड़ेगा
और आतंकवाद फेलाने वाले सरहदों के भीतर ही जश्न मनाते रहेंगे !!
इसलिए यह ज़ंग एतिहासिक हो और देश को किसी भी हाल मे नुक्सान पहुँचने वाली न हो ...
युद्ध इस कसोटी पर कभी खरा नहीं उतर सकता !!!
क्योंकि यह लडाई हिन्दू मुसलमान की नहीं अच्छाई और बुराई ही है !!!

ना राम हमारा है, ना रहमान तुम्हारा है
ना बाइबल हमारा है ना कुरान तुम्हारा है
हम एक माँ की औलाद है
क्या
क्या हमारा क्या तुम्हारा है।

लेखक का ब्लॉग: http://www.yaadonkaaaina.blogspot.com/

प्रतिक्रिया या पूर्वक्रिया


[राघवेन्द्र सिंह]

बहस
और प्रतिक्रिया के अलावे हमारे पास करने को बचा क्या है? बहुत लगा, तो छोटे-२ समूहों में चर्चा करके अपनी भडांस निकल लिया करते हैं. यह सिर्फ़ मेरी बात नही है. अपने आस-पड़ोस में यही सब कुछ देखता आया हूँ. लेकिन यह भी एक सच है, कि हममें से कोई अपनी जिम्मेदारी पहचानता या कहूँ तो जानता ही नहीं है. और इसके साथ-साथ हम इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं कर सकते, कि हमारे करने के लिए रखा ही क्या है. नो डिबेट ओनली एक्शन के मूल मंत्र में हमें डिबेट की तो संभावनाएँ पता हैं, पर एक्शन की नहीं. आम जनता को सलाह दी जाती है, कि आप अपने आस-पास कुछ भी संदिग्ध चीज देखे, तो तुंरत इत्तिला करें, कानून-व्यवस्था में सुधार में अपना सहयोग प्रदान करें. ये सारी बातें अमल में नहीं आ पाती हैं.

वैसे आतंकवाद को कुछ तो प्रश्रय हमारे बीच से भी मिलता है. हमारी वर्गभेदी सोच भी लोगों को इस मुद्दे पे हममें साथ नही रख पाती है. आतंकवाद से लड़ने में हमें कुछ हद तक अधिनायकवादी भी होना पड़े, तो इसमे कोई गुरेज नहीं होना चाहिए. हमारे समाज के वैसे छद्म मानवाधिकारवादी, जिन्हें मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के मानवाधिकार की चिंता सताती है, क्या उन्हें उन आदमियों के इस तरह के अधिकार की कोई चिंता नहीं है. आतंकवाद की दोहरी परिभाषा गढ़ कर लोगों को दिग्भ्रमित ही किया जाता है. क्या ग़लत है, और क्या सही है. इसकी कोई हद ही नहीं है. राजनेताओं को भी ऐसे मौकों पर अपने क्षुद्र स्वार्थ की चिंता नहीं करनी चाहिए. यह बात कि "युद्ध के समय शान्ति की बात बेमानी है " इसे थोड़ा और बदलना चाहिए. १९४७ से लेकर आज तक तो हम इसी शान्ति-पाठ का सुमधुर वाचन हर एक घटना के बाद करते चले जाते हैं. कुछ दिनों पहले मेरे पास एक मोबाइल संदेश आया था- १९७० से लेकर अब तक ४५५५ से भी ज्यादा आतंकवादी घटनाएं हो चुकी हैं. यह क्या दिखाता है. ऐसा नही है कि आवाज सिर्फ़ इस बार ही उठ रही है. हर बार उठी आवाज को किसी समिति के रूप में आश्वासनों का जामा पहना कर हमें भुलावा दे दिया जाता है. हर बार के सुधार आयोग की रिपोर्ट पड़ी-की-पड़ी रह जाती है. एक्शन की बात ऐसे बिन्दुओं पे उठे, तो यह ज्यादा अच्छा होगा. वीआईपी की सुरक्षा पर करोड़ों के खर्च से बेहतर है, कि उतने से कम खर्च में पूरे तंत्र की ही चिकित्सा की जाए और इलाज़ में लगने वाले करोड़ रुपयों के बदले उतने से "सतर्कता ही बचाव" के पुराने नारे पर अमल किया जाए. सुरक्षा व्यवस्था का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें संसाधनों से लैस करना होगा. वरना पुरानी राइफल से अत्याधुनिक हथियारों का सामना करने ही हिम्मत कौन उठा सकता है, मेरी समझ से हममें से कोई भी नहीं. वे जो मरे या लड़े, वो भी हमारे ही बीच के थे, कोई अतिमानवीय शक्ति-संपन्न नहीं, जिन्हें बिना उचित संसाधन और मनोबल प्रदान किए हम उनसे सिर्फ़ उनके कर्तव्यपालन की उम्मीद लगाये बैठे रहें. आतंकवाद के इलाज़ के लिए पोटा जैसे क़ानून को उनके मानवाधिकार की दुहाई देकर निरस्त कर दिया जाता है, तो फिर हम उस व्यवस्था से क्या उम्मीद करें, की वो सही मायने में अब भी इसके खिलाफ तनकर खड़ी हो सकती है. बांग्लादेशी घुसपैठिये, जो भारत की जमीं पर कई भारतविरोधी गतिविधियों में संलिप्त होते रहे हैं, उनपर दशकों से कोई कारवाई नहीं हुई है. बस देश की जनता को यह कह कर गुमराह किया जाता है कि ऐसी कोई गंभीर समस्या नहीं है. वे कुछ मुट्ठीभर हमारे भाई हैं, जो काम और रोटी की तलाश में हमारे यहाँ आए हैं. हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस घटना का संज्ञान लेते हुए इस इससे निबटने को कहा भी, परन्तु वही ढाक के तीन पात. आसाम छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष सोनोवाल महोदय लंबे समय से इसकीख़िलाफ़ अभियान छेड़े हुए हैं. जब एक उस स्तर के व्यक्ति के दशकों लंबे संघर्ष का कोई प्रतिफल नही निकला, तो आम जनता क्या मनोबल लेकर आगे बढेगी. और हममें से किसी से भी यह छुपा नही है कि बांग्लादेशी घुसपैठिये भारत में आतंकवाद के लंबे जाल का एक अहम् हिस्सा हैं. कुछ दिनों पहले मुझसे एक बात कही गई थी, कि हम ही इनके शिकार क्यों होते हैं, इसका मेरे पास बस एक यही जवाब था- हमारी अंधी सहिष्णुता. सहिष्णुता को भी फिर से परिभाषित किए जाने की जरुरत है, की उसका उल्लेख किस संदभ में हो, और कहाँ हो. जब हमारा अस्तित्व ही नही, रहेगा तो हम अपनी महान सहिष्णुता का पाठ भी साथ में लिए चले जायेंगे.
सीधे कहूँ, तो हमें अब "प्रतिक्रियावादी (reactionist)" की जगह "पूर्वक्रियावादी (pro-actionist)" हो जाना चाहिए।

बेबस क्यूँ है इन्सान



[अमित
सागर]

जलता हुआ पतंगा चीखा
जलता है क्यूँ ये शमशान
भारत की आज़ादी बोली
बेबस है क्यूँ ये इंसान
जूझ रही है लाचारी से
सहके सब भारत भूमि
कहाँ है सोने की चिडिया
पीछे जिसके दुनिया घूमी


दिन ढलते ही बुझ जाती है
आजादी की क्यूं ये मशाल
भारत की आज़ादी बोली
बेबस है क्यूँ ये इंसान

नम हैं दिल पत्थर हैं
चेहरे पर मायूसी हैं
देख रहें हैं डूबता सूरज
अधरों पर खामोशी है

हर इंसा के हाथो में है
दुश्मनी का ही पैगाम
भारत की आज़ादी बोली
बेबस है क्यूँ ये इंसान

नई सदी है नया दौर है
हाहाकार अब चारो और है
सामाँ मौत का हुआ है सस्ता
बर्बादी का बचा है रस्ता
नारी बेबस नर बेबस है
कौन सुखी है सब बेबस है
देते क्यूँ हमको इल्जाम

भारत की आज़ादी बोली
बेबस है क्यूँ ये इंसान
--

(अमित सागर वेब और मंच पर एक सुपरिचित युवा कवि हैंभारत की आज़ादी के माध्यम से इस युवा कवि ने इन्सान की मज़बूरी बेबसी को उकेरा हैअमित सागर ने जो सवाल उठाये हैंवो कहीं कहीं हम सबके भीतर उठते हैं)
ध्वनि संपर्क 09213589921
लेखक का ब्लॉग: http://sagaramit।blogspot.com/


महिला उत्पीड़न के मनोवैज्ञानिक आयाम



[डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
]

नीति, न्याय और सत्ता का तथाकथित कर्ताधर्ता पुरुष नहीं चाहता कि उसकी सत्ता को कोई चुनौती दे। अपनी इस सत्ता को बरकरार रखने के लिए उसने स्त्री को पराश्रित, पराधीन बनाने के लिए सदियों से विज्ञान, कला, संस्कृति, दर्शन, चिंतन की दुनिया से इसलिए दूर रखा ताकि वह शिक्षित, चेतन, सजग, आत्मनिर्भर न बन सके क्योंकि उसे सदैव डर बना रहता है कि स्त्री अपने स्वत्वाधिकारों की मांग न करने लगे ? इसलिए उसे निरक्षर, चेतना रहित बनाकर रखना पुरुष सत्ता के लिए अनिवार्य सा हो गया है। सोलहवीं शताब्दी की सामंती सोच पुरुषों में आज भी कायम है। आधुनिक युग में सोचने की दशा एवं दिशा बदली है। २१वीं सदी में 'स्त्रीधर्म' की बातें सुनते-सुनते पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता तथा शील एवं सेक्स की मर्यादाओं को तोड़कर स्त्रियों ने पुरुषों के समक्ष एक मनोवैज्ञानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि अब बात 'पुरुष धर्म' की भी होनी चाहिए ? समस्या की मूल जड़ यहीं से आरम्भ होती है।

जिस पश्चिम उपभोक्तावाद को अक्सर हम समाज की मूल्य विहीनता के लिए दोषी ठहराते हैं, उससे जन्मी नई जीवन शैली में स्त्री उत्पीड़न कम होना चाहिए, पर ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकिें स्त्रियों के मामले में हमारा यह समाज चेतना के स्तर पर सामंती है। शैक्षिक और आर्थिक विकास ने एक नया पाखण्ड पूर्ण मानस बना दिया है। यहां कहीं न कहीं हमारी नियति में खोट है। यह बात कुछ हद तक सही भी हो सकती है कि पुरुष वर्चस्व और सामंती उत्पीड़न के खिलाफ स्त्रियों में बढ़ रहे प्रतिरोध के कारण उन पर हिंसा भी बढ़ रही है। यह प्रतिरोध ग्लोबल चेतना के कारण बढ़ा है। एक ओर तो हम आधुनिकता की बात करते हैं, बदलाव की बात करते हैं, पर विचारों व मानसिकता में जो बदलाव अपेक्षित है वह बदलाव आज तक नहीं आया। जब-जब स्त्री अधिकारों की बात आती है तो परम्पराओं के नाम पर उसका हनन होता है।

देश के महानगरों और महानगर बनने की कगार पर खड़े नगरों में कास्मोपॉलिटिन संस्कृति का प्रभाव उठान पर है इससे पुरुषों में यौन कुंठा और निराशा दोनों बढ़ी है। नगरों में स्त्रियों के साथ बढ़ रही छेड़खानी और बलात्कार की घटनायें इसकी अभिव्यक्ति है। स्त्रियों से ये छेड़खानी और यौन दुव्र्यवहार की घटनायें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सामाजिक जागरूकता और विकास के आंकड़े कुछ भी कहें, हकीकत यह है कि स्त्रियों के प्रति परम्परागत पुरुषवादी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। आखिर खोट कहां है, इसके पीछे कौन से समाजशास्त्रीय कारण हंै ? आखिर इस बढ़ती उच्छंृखलता के लिए कौन दोषी है ? वर्तमान परिदृश्य से देखें तो आबादी निरन्तर बढ़ रही है साथ ही आर्थिक परिदृश्य भी बदल रहा है। लाखों लोग गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से बड़े शहरों की तरफ आ रहे हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार के लिए आने वाली यह आबादी बहुत सी चीजें पहली बार देखती है। दरअसल बहुत से लोग पहली बार, पहली पीढ़ी के रूप में शहर आए होते हैं, इन्हें लगता है जो स्त्रियां जींस पहनती हैं, पॉश कालोनियों में रहती है।ं वे अनैतिक होती हैं या जो महिला सहकर्मी इनके साथ कार्यालयों में या सार्वजनिक स्थलों पर खुलकर बातें करती हैं या एक ही कक्षा में साथ-साथ अध्ययनरत हैं उसका भी ऐसे लोग दूसरा अर्थ निकालते हैं। अनेक और भ्रम उनके मन में होते है। ऐसे ही ये भिन्न प्रकार से उत्पीड़न की घटनायें करते हैं। रही बात लालच या दबाव देकर शोषण की तो अवसर के नाजायज लाभ तो उठाए ही जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है कि वर्तमान में पुराना सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है। शहरों में अपनत्व की भावना एवं जानकारी का अभाव रहता है। पहले ग्रामीण संस्कृति थी तो लोग एक दूसरे को जानते पहचानते थे और सामाजिक भय से ऐसी हरकतें करने से डरते थे।

आज हमारा समाज मोनोटाइजेशन की तरफ बढ़ रहा है, संस्कृति में गिरावट आ रही है और लोग निरंकुशता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे कुछ भी गलत करके भाग सकते हैं लिहाजा ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है। इन्हें लगता है कि कोई कुछ करेगा नहीं, पुलिस करप्ट है, कानून व्यवस्था पैनी नहीं है। अधिकारियों और नेताओं को लगता है कि वे सत्ता में है, कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता और ऐसे में वे अपनी इच्छानुसार गलत कार्य करने से परहेज नहीं करते। स्त्रियां आज के आधुनिक दौर में जिस प्रकार हिंसा का शिकार हो रही हैं, वह समाज व सरकार के लिए चुनौती है, परन्तु यहां वास्तविकता यह है कि पुरुष प्रधान समाज स्त्री की सत्ता को पचा नहीं पाता। उसे लगता है कि स्त्री गम्भीरता से काम नहीं करती। जबकि स्त्री पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक होता है। घर से लेकर बाहर तक वह अपनी जिम्मेदारियां समझती है। वह कुछ बेहतर करना चाहती भी है तो करने नहीं दिया जाता। सामाजिक प्रतिबंध और राजनीतिक प्रतिरोध के चलते स्त्रियों का अधिक विकास अभी भी जैसा होना चाहिए नहीं हो पाया है। पुरुष प्रधान समाज ने स्त्रियों को आगे बढ़ने से रोका है।

वर्तमान की बात कत करें तो उदारीकरण और स्त्री मुक्ति के इस दौर ने एक और तो स्त्रियों के लिये बंद कई दरवाजे खोल दिये हैं, साथ ही घर से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाने के लिए अवसर तो दिए लेकिन दूसरी तरफ स्त्रियों के लिए दिखावा नामक एक जंजीर भी पैदा कर दी है उपभोक्तावाद और प्रदर्शनवाद ही उसका जीवन सिद्धान्त बन गया और वर्ग का बंटवारा एवं संस्कृति का स्तर तय किया जाने लगा क्योंकि मध्य निम्न तथा उच्च वर्ग की स्त्री के बीच आधारभूत अंतर यह है कि उच्च वर्ग की लड़की जब मारी जाती है, तो वह रसोई में जलती नहीं बल्कि गोली से मारी जाती है या छुरे से। उसकी मौत रसोई में नहीं बल्कि होटल में होती है या फिर सड़क पर क्योंकि उसकी जीवन शैली भिन्न है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि उच्च वर्ग की स्त्रियों का शिक्षित और आधुनिक होना गलत नहीं है, पर आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में आधुनिक परिवार के स्त्री पुरुष शारीरिक सम्बन्धों को सिर्फ मनोरंजन भर मानते हैं और यही सम्बन्ध उन्हें एक दिन मरने पर मजबूर कर देते हैं। यहां इसके पीछे एक कारण यह है कि स्त्रियां पुरुषों से बराबरी करने के लिए नयी जीवनशैली को अपनाती हैं जिसके कारण उनके अंदर एक अंतद्र्वन्द्व चलता रहता है कि क्या करें क्या न करे ? जिससे वे अपने मातृत्व व पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वाह से अलग हो जाती है यहीं से पारिवारिक कलह की शुरूआत होती है, जहां एक ओर तो इन्हें बच्चों का मोह रहता है, तो दूसरी ओर वे सोचती हैं कि बच्चे उनकी स्वतंत्रता और प्रगति में अवरोधक हैं इसके लिए जरूरी है स्वयं को व्यवस्थित करना।

उच्च वर्ग की पहली और आखिरी विशेषता होती है धन। वह जमाना गया जब धन कमाने में काफी समय लगता था और कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। अब भी जिसे ईमानदारी से धन कमाना है उसके लिए यही रास्ता है लेकिन काला धन बटोरने के लिए कई रास्ते खुल गये हैं क्योंकि अब का नियम है कि वह जिस रास्ते से आता है उसी रास्ते से जाता है। इसलिए काला धन भी काले रास्ते से जाता है लेकिन जाते-जाते अपनी चपेट में स्त्रियों को ले जाता है। आखिर इसकी वजह क्या है ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्त्रियों में शिक्षा स्तर बढ़ा है लेकिन यह शिक्षा उन्हें वैज्ञानिकता, कलात्मकता या सृजन की तरफ नहीं उच्ंछृखलता की ओर ले जा रही है। मदिरापान, क्लब एवं पब संस्कृति और अद्र्धनग्नता को ही सबलीकरण का मापदण्ड माना जा रहा है जबकि पुरुषों के लिए मापदण्ड हमेशा अलग ही रहे। अद्र्धनग्नता किस तरह हमारी पहचान बनी इसे इस बात से समझा जा सकता है कि पहले सिनेमा की हीरोइन कभी 'कैबरे' नहीं नाचती थी। आज यदि वह काम और किसी को मिला तो हीरोइन डरती हैं कि इमेज फीकी हो गयी। प्रदर्शन की इस चाह ने तत्काल स्त्रियों को दो जरूरतों में बांध दिया। पहली जरूरत यह कि उसके पास पर्याप्त पैसे हों और दूसरी यह कि वह सदा आमंत्रक, लुभावनी लगती रहे। देखें तो दोनों बातें एक दूसरे की पूरक भी हैं। किसी उच्च शिक्षित स्त्री के पास ये दोनों हों तो वह क्या नहीं कर सकती है? इसका एक उदाहरण हमारे जेहन में बड़ी गहराई से छाया हुआ है। वह है, एनरॉन की चर्चित रेबेका मार्क, जिसने भारतीय शासन प्रशासन के कई दिग्गजों कोे सामदाम, दंडभेद के प्रयोग से नाच नचा दिया और मंतव्य पा ही लिया लेकिन हमारे देश की स्त्रियों के लिये वैसी बात करना कल्पना से भी परे है। फिर किस बात का सबलीकरण ? अधिकतर महिलाओं का सपना क्या होता है ? यही कि पार्टियों की रौनक बनी रहे। उनके पास कारें तथा सुविधा के अन्य साधन हों और वे जीवन का भरपूर आनंद उठायें, मीडिया और विज्ञापनों ने भी इसे खूब बढ़ावा दिया है उसने तो एक और सपना भी जोड़ दिया। टी. वी. स्क्रीन पर झलकने का। क्या ऐसे सपने गलत हैं ? शायद नहीं, तो फिर विसंगति कहां है ? विसंगति यही कि सपने को अपना हक माना जाता है, चाहे योग्यता हो या न हो। जब योग्यता नहीं होती तो माना जाता है कि रूप और यौवन उनके पर्याय हैं जहां धन और सुविधायें है उनका उपयोग योग्यता बढ़ाने में नहीं बल्कि आनंद उठाने और मौजमस्ती में ही सार्थक समझा जाता है। यह वह दौर है जिसमें सब कुछ जायज है, यहां तक कि विवाहेत्तर सम्बन्ध भी लेकिन यहां फिर पुरुष अहंकार को चोट लगती है। खानदान की इज्जत का सवाल उठाया जाता है और कटारा कांड भी हो जाता है। इन सम्पूर्ण घटनाओं के पीछे उच्च वर्ग का पुरुष कहां है ? उसे धन और आनन्द के साथ-साथ सत्ता की भी लालसा है, जिसके लिए स्त्री सीढ़ी बन सकती है। विरोध करने पर उसे तंदूर में जलाया जा सकता है और सजा की चिन्ता क्यों हो ? आखिर पैसे के बल पर मुकदमे की सुनवाई को जितनी मर्जी हो घसीटा जा सकता है क्योंकि आज धन, सत्ता और उनमुक्त आनन्द का त्रिकोण बन गया है अधिकतर स्त्रियों को यह झटपट चाहिए। हर बड़े महानगरों में कई फार्म हाउस पार्टी और पब के अड्डे बन चुके हैं जहां मदिरा है, रूप यौवन है और एक फलसफा है कि असली जिन्दगी यही है। कभी-कभी जब वहां से झूमते-झूमते बाहर निकले लड़के-लड़कियां कार दुर्घटना में किसी की जान ले लेते हैं तो दो-चार दिन हो हल्ला मचता है और अन्मुकता फिर अवाध गति से चलने लगती है। कभी किसी जेसिका की जिद को समाप्त करने के लिए इतने सहज भाव से गोलियां दग जाती है, मानों यह कोई रोजमर्रा की बात हो। कोई नहीं पूंछता कि क्या गोली चलाने वाला हमेशा से इसका आदी है। यह वास्तविकता है कि यह उन स्त्रियों के हिस्से में दुष्परिणाम आया, जो एक ओर तो उन्मुक्कता की दुनिया की लालसा में थीं पर दूसरी ओर अपने वजूद के लिए विद्रोह भी कर रही थीं यह भूलकर कि वजूद अपनी योग्यता और कुशलता से बनता है, केवल शराब और सेक्स के दर्शन से नहीं।

हम कितना ही प्रगतिशील होने का ढोंग क्यों न करें, सच यह है कि हमारी मानसिकता स्त्रियों के प्रति हमेशा दकियानूसी रहती है पुरुष मानता है कि स्त्री का स्थान घर की चारदीवारी के अंदर ही है। 'नताशा कांड' पर एक नामी गिरामी वकील ने टी. वी. कैमरे के सामने टिप्पणी की कि वह आधी रात के समय घर से बाहर क्या कर रही थी, वह मां थी उन्हें अपने बच्चों के साथ होना चाहिए था। यह एक कटु सत्य है कि जब पुरुष ही आज सड़क पर सुरक्षित नहीं है तो मध्य रात्रि में सड़क पर अकेली स्त्री कैसे सुरक्षित रह सकती है ? मुख्य समस्या यहां यह है कि स्त्री, पुरुष की बराबरी का दम भरने के लिए नयी जीवन शैली अपनाती है परन्तु इस शैली को अपनाने के लिए उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का ज्ञान और अहसास नहीं होता है। यहां एक दूसरी बात जो नयी घटित हुई है वह यह कि हिंसा और लूट में अब स्त्रियों ने भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया है इसलिए अब वे इन सबकी शिकार भी हैं और हिस्सेदार भी। भारत में हर बात के लिए पश्चिम को दोषी ठहराने का रिवाज है, पर विकसित समाजों में उतना स्त्रियों पर अत्याचार नहीं होता जितना सामंती समाजों में होता है। भारतीय समाज में पुरुषों की सामंती मानसिकता का मूल संकट भी यही है कि एक ओर उसे पवित्रता और आज्ञाकारी पत्नी चाहिए तो दूसरी ओर शाम को एक आधुनिक स्त्री। पिछले कुछ दशकों में हुए बड़े सामाजिक आर्थिक बदलावों के बाद महिलाओं का जो शिक्षित और स्वावलम्बी तबका विकसित हुआ है वह एक साथ इन दोनों जरूरतों को पूरा करने में पिस रहा है। उच्च वर्ग का पुरुष शाम की पार्टियों में दूसरी स्त्रियों के साथ ड्रिंक और ड्रांस तो करना चाहता है, पर जैसे ही उसकी अपनी पत्नी या बहन, बेटी किसी दूसरे के साथ ड्रिंक और ड्रांस करने लगती है, तो वह क्रोधित हो जाता है यानी आर्थिक विकास और गतिशीलता के बावजूद सामंती चेतना नहीं टूटी है। मूल समस्या यहीं है क्योंकि स्त्री; पुरुष प्रधान समाज की एक कृति है वह अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए स्त्री को जन्म से ही अनेकों नियमों के ढांचे में ढालता चला गया। सौन्दर्य, भाव संवेदना, सेवा-साधना, अशीम धैर्य, अनन्त ममत्व और बोधगभ्यता जैसी अनेकानेक विशेषताओं के रहते हुए भी स्त्रियों को इतने प्रतिबंधों दबावों के बीच रहने के लिए क्यों बाधित होना पड़ रहा है ? इसका एक समाजशास्त्रीय कारण यह है कि प्रबल पर सबल हमेशा भारी रहा है और संत्रस्त लोग आपस में ही निपटते रहते हैं। यह उदाहरण स्त्री वर्ग में ही बहुलता के साथ चरितार्थ होते देखा जाता है क्योंकि अक्सर देखा गया है कि कन्या के जन्म पर पिता की तुलना में माता को अधिक दु:खी होते देखा गया है। वही पुत्र को अधिक दुलारती और सुविधा देती देखी गयी है। सास-बहू की लड़ाई कुत्ता-बिल्ली के वैमनस्य की तरह प्रख्यात है। ननद का व्यवहार भी भाभी के प्रति ऐसा ही रहता है, मानो उसे जीवन भर ननद का रुतवा ही प्राप्त रहेगा, कभी किसी की भाभी बनने का अवसर आएगा ही नहीं। दहेज अधिक लेने का आग्रह और न मिलने पर आक्रोश प्रकट करने में वे ही पुरुषों की तुलना में अग्रणी रहती हैं। नारी प्रगति के लिए कुछ किये जाने का प्रसंग जब कभी सामने आता है तो इसमें अधिक विरोध, व्यवधान घर की बड़ी बूढ़ी कहीं जाने वाली महिलायें ही बनती हैं। इस मनोवृत्ति को क्या कहा जाये कि जिनकी लड़कियां काली कुरूप हैं वे तो किसी सुंदर लड़के को हाथ सौंपना चाहती है, किन्तु अपने काले कुरूप लड़के के लिए सुन्दर बहू तलाश करती हैं। नाक-नक्श में तनिक भी कमी रहने पर वे ही नापंसद करने में अग्रणी रहती हैं, जिनकी अपनी बच्चियां पराये घरों की तुलना में भी अधिक हल्की पड़ती ह।ै। बेटी और बहू के साथ होने वाले बरताव में जमीन आसमान जैसा अंतर रहने का निमित्त कारण उस घर के पुरुष नहीं बनते, जितना कि महिलायें जमीन-आसमान सिर पर उठाए रहती हैं।

निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि स्त्री उत्पीड़न की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया घर की दैहरी से लांघकर सम्पूर्ण समाज को अपनी मुट्ठी में कसती चली जा रही हैं क्योंकि आज छोटे परदे से लेकर बड़े परदे तक एवं अखबारों पत्र-पत्रिकाओं सभी में नारी देह को भोग्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नग्न देह के लिए वह उत्पाद की प्रचारक बन गयी है। मसाज पार्लर, फ्रेंडशिप क्लब,सौन्दर्य प्रतियोगितायें और इण्टरनेट के जरिये स्त्रियों की देह का बाजार चलाया जा रहा है, चाहे सौन्दर्य उद्योग हो या सिनेमा अथवा व्यवसाय, सब पर पुरुषों का कब्जा है। इसलिए उन्होंने नारी शरीर का बाजारीकरण करके अपना ब्रांड बेचने का जो अंतहीन सिलसिला शुरू किया जिसका कुप्रभाव स्त्रियों पर उत्पीड़न (छेड़छाड़, बलात्कार, अमानवीय कृत्य) विविध रूप से हमारे समक्ष घटित हो रहा है। उत्पीड़न से बचने के लिए पुरूष को आज अपनी परम्परावादी मानसिकता को बदलना होगा इसके साथ ही महिलाओं को अधिक महत्वाकांक्षा का त्याग कर व्यवहारिक धरातल पर कुछ समझौते करने होगें।

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(लेखक डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव हिन्दी विभाग डी. वी. कालेज, उरई (जालौन) में वरिष्ठ प्रवक्ता हैं)

मोतीराम

[मोतीराम देश के राजनैतिक माहौल में एक छोटे से गाँव उमरानाला में आवाम के अपने नेता को चुनने की कहानी हैजिसे आम जनता चुनाव में ख़ुद लड़वती है और जिताती भी हैजिस दिन देश में जनता ख़ुद अपना प्रत्याशी तय करेगी वास्तव में तब ही जनतंत्र के सूर्य का उदय होगामोतीराम ब्लॉगर अमिताभ की कलम से निकली एक इलाकाई रचना है । जो आप सभी के लिए गणतंत्र दिवस पर हमारी विशेष भेट है]




(एक)
खादी का कुरता सिर पर सफ़ेद टोपी ...मोतीराम को उमरानाला का बच्चा बच्चा "नेताजी" के नाम से जानता था । मोतीराम का के पास अपना कहने के लिए कुछ भी नही था । कोई सगा सम्बन्धी नही न कोई नातेदार न ही रिश्तेदार ..शायद यही वजह भी थी कि वो फुल टाइम नेतागिरी करने लगा । लोगो का गम अपने दिलो दिमाग पर लेना उसका पैदाईशी शौक था । गाँव में जनतंत्र का वो ही एक मात्र झंडाबदार है उसे लगता । समाज सेवा करना । लोगो के सुख दुःख में बढ़चढ़कर भाग लेना उसे भाता , चुनाव से पहले इलाके में उसकी कद्र बढ़ जाती । बड़ी बड़ी पार्टियों के लीडरों के बीच उसकी पूछ परख बढ़ जाती ।

मोतीराम जैसे शख्स किसी पार्टी से बंध के नही रह सकते ..गाँधी टोपी से आर एस एस की निक्कर तक, हरी समाजवादी टोपी से लालक्रान्ति तक मोतीराम ने हर तरह का चोला पहना । कभी किसी दल का दिल नही दुखाया मोतीराम अपने आप में सर्वदलीय व्यक्ति थे । भारत में साझा सरकारों की शुरुआत जब भी हुई हो लेकिन मोतीराम भविष्य की राजनीति को काफ़ी पहले ही समझ चुके थे । उनकी पहल पर ही गाँव में बहुदलीय लोगो ने मिलकर गाँव की शिक्षित महिला पंखी बाई को सरपंच बनवाया ।

मोतीराम चाय की दुकान पर काम करता था । गाँव के लोगो तक अपने विचार और राजनैतिक संबोधन वो इसी चाय की दुकान से संप्रेषित करता था । मिया की चाय की दुकान में लोगो का जमघट सिर्फ़ मोतीराम की वजह से ही लगता । कुछ लोगो की नज़र में नेताजी सरफिरे भी थे तो कुछ लोग मोतीराम को मज़मा लगाने वाले से ज़्यादा नही समझते थे । क्षेत्रीय ,प्रांतीय ,राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय हर मुद्दे पर उससे चर्चा करते । चाय के झूठे कप प्लेट धोने के आलावा वो दिनभर पूरे अखबार को भी एक तरह से पी जाता था । कुछ लोग ख़ुद खबरे पढने के बजाय मोतीराम से खबरें पूछना पसंद करते थे । वो चाय के साथ साथ लोगो को बड़े दिलचस्प अंदाज़ में खबरे बताता ... कभी कभी वरिष्ठ संपादक की भांति वो ख़बरों पर अपनी टीप भी देता ।

बहरहाल , गाँव में विधान सभा चुनाव की हलचल शुरू हो चुकी थी ।चुनाव के समय मोतीराम चाय की दुकान से छुट्टी ले लेता । और जम कर चुनाव प्रचार करता । मोतीराम अपने महारथी दिमाग से चुनाव का गणित बैठाल लेता । और वो उसी दल का प्रचार करता जो जीतने की हालत में होता । " नेता जी "के पास नेताओं की आवा जाही होने लगी । मोतीराम केवल चुनाव के समय ही लोगो को याद आ ता है एक रात केशव वकील ने उससे कहा । मोतीराम कुछ सोचो ? तुम ख़ुद क्यों नही चुनाव लड़ते । मैं और चुनाव ..मोतीराम को हसी आई । लेकिन वकील साहब ने कहा मोतीराम सोच के देखो अगर तुम विधायक बन गए तो इस गाँव की हालत बदल जायेगी । वकील साहब उसे एक एक कर चुनाव लड़ने से होने वाले सार्वजानिक फायदे गिनवाने लगे । मोतीराम कुछ बातें समझ पा रहा था कुछ बातें उसे समझ नही आ रही थी । चुनाव में तो खर्चा भी बहुत ज्यादा होता है । मैं ठहरा भूखा नंगा आख़िर मैं क्या दम लगा के चुनाव लडूंगा उसने वकील साहब से कहा ...

(दो)

मोतीराम ने सोचा रात गई बात गई ! चुनाव लड़ने की बात उसके जीवन में नई पहेली थी । हालाँकि उसे नेतागिरी करना अच्छा लगता था लोग उसे "नेताजी" बोले उसे यह भी पसंद था । लेकिन चुनाव लड़ना वो भी एम् एल ए(विधायक) का "तौबा तौबा "। इधर केशव वकील भी जैसे जिद पर अडे थे उन्होंने मोतीराम को चुनाव लड़वाने के लिए कई तगडी फील्डिंग कर दी थी । गाँव के ऐसे बुजुर्ग जिनकी बात मोतीराम कभी नही टालता था उनको केशव ने मना लिया था । उमरानाला के बुद्धिजीवी वर्ग भी इस बात के लिए उसका साथ दे रहा था कि क्यों न इस बार उम्मीदवार हमारे ही गाँव का हो ,जो हमारी उम्मीदें भोपाल विधानसभा में लेकर जाए । मोतीराम इस लिहाज से भी फिट उम्मीदवार था कि उसका हर पार्टी में निचले स्तर से ऊँचे स्तर तक कोई न कोई शुभचिंतक था । उस पर भी सबसे बड़ी बात यह कि मोतीराम का न कोई आगे था न कोई पीछे ..हर लिहाज़ से एक उपयुक्त जनसेवक एक उपयुक्त नेता "नेताजी" !!

शाम होते होते पूरे गाँव में यह चर्चा आग कि तरह फ़ैल गई उनका अपना नेताजी मोतीराम चुनाव लड़ने वाला है । काफी मानमनुव्वल के बाद मोतीराम ने हामीं भर दी । अख्तर टेलर ने एक ही रात में पाँच जोड़े कुरते पैजामें सिलने का भरोसा वकील साहब को दे दिया । कुरते पैजामें के कपडे लेखराज वस्त्र भण्डार ने दिए । माधव जनरल स्टोर्स के सौजन्य से चार खादी के झोले भी आ गए । मोतीराम की बाह्य और आंतरिक साजसज्जा का ख्याल उसके सभी चाहने वालों ने बखूबी रखा । मियां की चाय की दुकान जिसमें मोतीराम काम करता था । उसके मालिक अब्दुल मियां ने चाय की दुकान के ऊपर का कमरा चुनाव कार्यालय के लिए दे दिया । साथ ही चाय नास्ता आदि भी प्रचार के दौरान अपनी तरफ से मुफ्त देने का भरोसा भी दिया ।

मोतीराम के चुनाव प्रचार के लिए गाड़ियों का इतेजाम देवाजी ने कर दिया । तय हुआ की मंगलवार के शुभ दिन नामांकन का पर्चा भरने चार ट्रक भरके लोग मोतीराम के साथ जायेंगे । मोतीराम के नाम से पर्चे बैनर झंडे पोस्टर के लिए भी पैसों का इंतजाम हो गया ।

लेट लतीफी के लिए मशहूर अख्तर टेलर ने वायदे के मुताबिक एक ही रात में पाँच जोड़े कुरते पैजामे सिलकर दे दिए। सबने अख्तर टेलर की चुटकियाँ ली । मोतीराम को भी हैरानी और हसी फूट पड़ी । कुरते पैजामें का ट्रायल लिया गया । मोतीराम को कुरता थोड़ा छोटा और टाइट लगा । उसने अख्तर से कहा लगता बिना पिए ही कपडे सिलकर दिए हैं । सब जमकर हसने लगे । बात को सम्हालते हुए अख्तर ने कहा अख्तर अब दारू चुनाव जीतने के बाद ही पीयेगा । इस चुहल से माहौल थोड़ा हल्का हो गया ।

कुलमिलाकर नेताजी जनता के वास्तविक जननेता बनकर उभरने लगे । इस सियासी कसरत की गूंज छिंदवाडा में भी गूंजने लगी । एक एक कर बड़े दलों से उमरानाला के पदाधिकारी अनुशासन हीनता के आरोप में निकाले जाने लगे । ब्लाक मुख्यालय मोहखेड़ से भी बड़े नेता मोतीराम के समर्थन में आगे आने लगे ।

और मंगलवार का शुभ दिन आ गया । गाँव के प्रसिद्ध "आंजनी" के हनुमान मन्दिर में पूजा अर्चना के साथ मोतीराम ने चुनाव अभियान का आगाज़ किया । सुबह सुबह मोतीराम की बस स्टेंड में चुनावी सभा भी हुई । जिसमें आस पास के गाँव के लोग भी आए । उमरानाला के इतिहास में ये अब तक की सबसे बड़ी चुनावी सभा थी । मोतीराम ने अपने भावुक उदबोधन में गाँव की जनता से अपील की और कहा "ये लडाई अब मेरी नही आप सबकी है । चुनाव में मैं नही आप सभी खड़े है.."

नामांकन का पर्चा भरने मोतीराम का हजूम छिंदवाडा रवाना हो गया । जगह जगह उसका स्वागत हुआ । क्षेत्र के लोगो की उम्मीदों का कारवां बढ़ने लगा । लोग इस हजूम में बड़ी पार्टियों को छोड़कर शामिल होने लगे । ये समूह की अंतरात्मा की आवाज़ थी जो अपना नेता ख़ुद बनाना चाहती थी । नामांकन का पर्चा कलेक्ट्रेट में उसने दाखिल किया । और अपने चुनाव चिन्ह के रूप में मोतीराम ने सीढ़ी को पसंद किया । चुनाव चिन्ह सीढ़ी उसे पूरे क्षेत्र की तरक्की की सीढ़ी लगी ।नेताजी के साथ आम जनता भी आशाओं की सीढ़ी पर चढ़ने और मैदान फतेह करने का ख्वाब बुनने लगी

(तीन)
मोतीराम को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव चिन्ह सीढ़ी मिल गया । उमरानाला में साइन बोर्ड बैनर दुकानों के बोर्ड आदि बनने वाले पेंटर सागर ने मोतीराम के लिए चुनावी नारा /स्लोगन बनाया "काम करेगी इतना सीढ़ी याद रखेगी अगली पीढी " और... काम करेगी इतना सीढ़ी के जयघोष के साथ सभी तूफानी चुनाव प्रचार में जुट गए । केशव वकील ने मोतीराम के लिए पुरी चुनावी रणनीति तैयार कर रखी थी । जैसे मोतीराम को कब और कहाँ प्रचार के लिए जाना है । अख्तर टेलर ने भी अपनी दुकान पर कुछ दिनों के लिए टला जड़ दिया । पूरे प्रचार के दौरान केशव और अख्तर मोतीराम के साथ ही रहते।

इलाके में मोतीराम की चुनावी लहर चल निकली । एक लहर पूरे इलाके में बह रही थी । मोतीराम के नाम से अख़बार भी रंगने लगे। अख़बार में ख़ुद की ख़बरों को देख कर मोतीराम को अपने आप पर हैरानी होती थी । केशव बड़ी समझदारी से नेताजी के लिए चुनावी बिसात पर चाले चल रहा था । एक शाम छिंदवाडा गल्ला मंडी में व्यापारियों के बड़े नेता भज्जुमल की फूलछाप पार्टी के उम्मीदवार और प्रदेश के मंत्री चंदरलाल से कहा सुनी हो गई । भज्जुमल की इज्ज़त पूरा व्यापारी समाज करता था । भज्जुमल की एक आवाज़ पर व्यापारियों के नोट और वोट किसी भी उम्मीदवार का समर्थन करते थे । मंत्री चंदरलाल ने भज्जू को सरे आम अपमानित करके एक तरह से मुसीबत मोल ले ली । केशव वकील ने उसी रात गल्लामंडी में मोतीराम की चुनावी सभा करवाई । भज्जू लाल पूरे व्यापारियों के साथ मोतीराम के पक्ष में आ गए ।

व्यापारियों के मोतीराम के समर्थन में आगे आ जाने से फूलछाप और हाथ के निशान वाली बड़ी पार्टियों में चिंता की लकीरे बढ़ गई । मोतीराम की लोकप्रियता बढती जा रही थी .यही बात उसके विरोधियों को परेशान करने लगी । उमरानाला में तो जैसे बड़ी पार्टियों के लिए काम करने वालों का अकाल सा पड़ गया । इक्की दुक्की सभाओं को छोड़कर बड़ी पार्टियों की चुनावी सभा भी इलाके में नही हो रही थी । मोतीराम के खिलाफ कोई मुद्दा उनको नही मिल पा रहा था । मोतीराम के खिलाफ मुद्दा मिलता भी तो कैसे ? मोती तो एक सीधा साधा गरीब आदमी था ।
लेकिन प्यार और ज़ंग में सबकुछ जायज के सिद्धांत पर काम करते हुए विरोधी पार्टियों ने मोतीराम के खिलाफ झूठ का पुलिदा खोलना शुरू कर दिया । मोतीराम के चरित्र पर विरोधी सवाल उठाने लगे । दरअसल ,मोतीराम के चुनाव प्रचार में उमरानाला की सरपंच पंखी बाई उसके साथ साथ घूम रही थी । पंखी और मोती के रिश्ते को लेकर झूठे पर्चे जगह जगह बाटे जाने लगे । मोती और पंखी का रिश्ता क्या है ? मोतीराम पंखी शर्म करो के नारे दीवारों पर रंगने लगे । मोतीराम इस तरह के झूठे आरोपों से काफी आहत हुआ .लेकिन केशव वकील और ख़ुद पंखी ने उसे समझाया राजनीति में तो यही सब होता है .तुम केवल चुनाव को देखो और सोचो। उन उम्मीदों को देखो सोचो जो लोगो ने तुमसे लगा रखी है । चुनाव प्रचार दिन भाई दिन गन्दा होने लगा । मोतीराम बहुत सीधा और सरल आदमी था । दुष् प्रचार की गंदगी उसे लगातार आहत कर रही थी । लेकिन लोगो की उम्मीदें उसे इस संघर्ष में लड़ने का हौसला दे रही थी । मोतीराम जीत की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा था । उसके नाम की लहर चल रही थी । मोतीराम के कई रिश्तेदार जो मुफलिसी में उससे कन्नी काट लेते थे .वो भी उसके पास आने लगे थे । मोतीराम को अपनी ताकत का एहसास होने लगा था ।

चुनाव प्रचार का शोर खत्म हो गया । मोतीराम को पूरे प्रचार के दौरान विरोधियों द्वारा पंखी का नाम उछालना सालता रहा। उसने पंखी से इस बात के लिए क्षमा भी मांगी .और उससे विवाह का प्रस्ताव भी रखा। मतदान से ठीक एक दिन पहले उसने पंखी से शादी कर ली । केशव वकील ने और अख्तर ने उसका पूरा साथ दिया । मोतीराम ने पंखी से कहा ये शादी मैं किसी मजबूरी में नही कर रहा हूँ । पंखी उसकी ईमानदारी की कायल थी । उसने उसे जिंदगी की हर लडाई साथ में लड़ने का वचन दिया ।

और मतदान का दिन आ गया । मोतीराम के पक्ष में भारी मतदान हुआ । मतगणना वाले दिन भोर में ही मोतीराम और पंखी बजरंगबली के मन्दिर में पूजा अर्चना के बाद अपने दल बल के साथ छिंदवाडा रवाना हो गया । दोपहर तक परिणाम आ गए मंत्री चंदरलाल की ज़मानत जब्त हो गई .मोतीराम भारी मतों से विजयी हुआ । इलाके में मोतीराम की जीत का जश्न लोग मनाने लगे । वकील केशव ने मोतीराम से कहा प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा आई है । तुम चाहो तो मंत्री भी बन सकते हो ।

मोतीराम ने विनम्रता से कहा जैसा जनता चाहे ,ये जनता की जीत है । और उमरानाला बस स्टेंड से एलान किया की जनता की सेवा के लिए उचित दल की सरकार बने हम यही चाहते है । और क्षेत्र के विकास के लिए हम सरकार में भी शामिल होंगे । मोतीराम की जयकार होने लगी । गाँव की भोली जनता मिनिस्टर मोती का सपना देखने लगी।

लेखक का ब्लॉग: http://umranala।blogspot.com/
(तस्वीर आर के लक्ष्मण कॉमन मेन )

और कितनी सज़ा दोगी मुझे?

[मेरे ज़ज्बातों की कहानी मौजे सागर उल्टा तीर परिवार का ही एक ब्लॉग हैब्लोगिंग जगत के कुछ मित्रो के अनुरोध पर "और कितनी सज़ा दोगी मुझे ?" का हम प्रकाशन कर रह हैंदरअसल, मौजे सागर मेरे दिल का हाले बयां है ।]

कैसे हो तुम?

ये पूछना कि तुम कैसी हो, थोड़ा सा अटपटा है, इसलिए सोचता हूँ! तुम कैसे होगी? और इस बात पर कोई कयास लगाऊँ, ये अब कुतुर्ब सा लगता है। इसलिए बस एक दुआ करता हूँ, हमेशा ही, तुम बहुत ख़ुश और स्वस्थ हो।! और होना ही चाहिए। और यकीनन शायद तुम जानना चाहो कि मैं कैसा हूँ? तो मेरा जवाब हमेशा की तरह वही हो, जो तुम ख़ुश हो तो मैं बहुत ख़ुश हूँ।

तुम हर शय में हो, हर जगह हो!

जानती हो, २-३ दिनों के अन्दर एक दोस्त ने बड़ा झटका सा दिया मुझे। यकीन नहीं हुआ कि मुझे कुछ हुआ है या फ़िर उस क्षणिक पल में तुम ही ख़ुद-ब-ख़ुद आ गयीं थी। उसे मुझे कुछ ज़रूरी काम था सो उसने किसी और फोन पर मुझे फोन किया, उसने अपना नाम बताया आदतन, चूँकि मैं मोबाइल पर नहीं था, मैंने उसकी आवाज़ पहचान कर भी पूछ लिया, कौन बोल रहा है? और फ़िर उसने मुझे बना डाला। उसने उन २-३ पलों में जितनी धीमी आवाज़ से मुझसे बात की, और वो आवाज़ जिस तरह की बनी, मैं हतप्रत था, वो आवास उन पलों में सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी थी। दिमाग को एक करारा झटका। किसी और की आवाज़ तुम्हारी आवाज़ कतई नहीं हो सकती। लेकिन उन पलों में मैं खो सा गया। जैसे किसी रात में तुम्हारी आवाज़ में खो जाना, डूब जाना। बाद में मैंने सही से उससे बात की, पर आभास नहीं होने दिया नाहीं उसे कुछ जताया. बस, मैं तुममें कहीं फ़िर डूबता चला गया सब कुछ भूल के. अंततः मैंने सोचा इसकी बाबत तो मुझे यही लगा, तुम्हारी आवाज़ इन दिनों मेरे भीतर कुछ जादा ही हलचल कर रही है। हलाँकि इसका ये मतलब कतई नहीं कि वाधा पैदा हो रही हो कुछ भी करने में। लेकिन पिछले दिन ही उसका फ़िर फोन आया, इस बार कुछ नया था लेकिन था हमारा ही वही सदावाहार बाहार। "म्याऊं" उसे मुझसे कुछ काम था, काम की बात जब ख़तम हुई, उसने कहा: कुछ सुनाई आ रहा है? मैंने गौर दिया उसकी बात पर; किसी बिल्ली के बच्चे के "म्याऊं-म्याऊं" करने की आवाज आ रही थी। उसने बताया, उसके घर के पड़ोस में बिल्ली ने बच्चों को जन्म दिया है। एक बच्चा बड़ा प्यारा है, उसने उसे पाल लिया है। और अभी वो "म्याऊं-म्याऊं- कर रहा है। अब तुम बताओ मैं क्या कहता "म्याऊं" एक अजीब इत्तेफ़ाक था, एक बार का नहीं दो बार का। मैं इस बार भी चुप रहा। पर दिल को बहुत सुकून में कहीं पाया। और तुम्हारी आवाज़ की सरगोशियाँ, तुम्हारी यादों की बतियाँ इन दो दिनों में मुझे तुममें डूबने के सिवा और कुछ करने ही नहीं दे रहीं। बस तुम्हारी यादों में खोके दिल को करार आ रहा है। तुम्हें देखने का और तुम्हारी आवाज़ सुनाने के लिए मन बहुत तड़प रहा है। इस दिल की तड़प क्या तुम्हें सुनाई नहीं देती है जान!


क्या से क्या हुआ है?

मैंने तुम्हें हमेशा से अपनी ताकत बनाना चाहता रहा। लेकिन क्यों महसूस करता हूँ आज कि तुम मेरी कमजोरी बनती जा रही हो। इससे मुझे क्या मिलेगा? कुछ भी तो नहीं न? और तुमने तो कभी भी नहीं चाहा कि ऐसा कुछ भी हो। पर आज हो रहा है। ख़ुद से तुम्हारे दूर होते जाने का आशय मैं समझ सकता हूँ लेकिन यही तो उल्टा हो रहा है। जैसा तुम सोचके ऐसा कर रही हो, मैं वैसे ही आगे नहीं बढ़ पाने में ख़ुद को अक्षम सा महसूस कर रहा हूँ। हाँ, मानता हूँ और जानता हूँ एक न एक दिन तो सब कुछ बेहद अलग ही तरीके से बदल जायेगा। जिसे हम चाहकर भी नहीं बदल सकते. हलाँकि चाहते हैं. लेकिन नहीं! कुछ रास्तों के ऐसे भी मकाम हुआ करते हैं? जैसे कि एक कच्चे मकान का पक्के मकान में बनाना या फ़िर किसी महल का टूट कर बिख़र जाना सा। ज़िन्दगी भी ऐसी ही होती है न। बुनना, उधेड़ना, समेटना और बिखरना।

और कितनी सज़ा दोगी मुझे?


कभी-कभी मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता। न दर्द और न खुशी। न रास्ते न मंजिल। न बहना और न ठहराव। बस तठस्थ सा होना। ये क्या है। तुम किसी भी तरह साथ देतीं तो शायद मेरे सवाल हल हो जाते। इन सवालों की गुत्थियों को मैं कहाँ लेके जाऊं? मुझमें न तो अब ठहराव प्रतीत होता है और न बहाव ही। क्या ऐसी स्तिथि नाज़ुक और खतरनाक नहीं होती? और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि ज़िन्दगी कट रही है। फ़िर चाहे जैसे भी। मगर ऐसे क्यों? कि आज से आने वाले भी हर वक़्त में सिर्फ़ ख़ुद से करने के लिए सवाल ही होंगे? क्या ये बुरा सा नहीं? जहाँ न कोई संभावना दिखती हो और न कोई मकाम वहाँ ठहर के कोई ख़ुद को क्या कहेगा? या क्या कह सकता है?

मैं चाहता हूँ कि अब ये हाले-दिल बदले

तुम मेरे गुनाह माफ़ क्यों नहीं कर देतीं? और मैं जिन गुस्ताखियों को, जिन गलतियों को गुनाह कहता हूँ; सचमुच वो गुनाह तो नहीं, मगर मैंने गुनाह सी सज़ा काटी है मगर अभी और कितनी मेरे खुदा? क्या प्यार से बढ़कर वो कुछ बातें बहुत जादा अहम् हो जायेंगी जिन्हें मैंने तुमसे बिना ये सोचे-समझा कहा; कि तुम्हें कितना दुःख महसूस हुआ होगा या फ़िर वो सब कुछ इतना बड़ा हो जायेगा जब मैंने तुम्हारी हर बात मानकर भी नहीं मानी। तुम यकीन करो आज मेरी ओर से बहुत कुछ बदल गया है। प्यार में बदले जैसी कोई भावना नहीं मेरे अन्दर अब। पर क्या कभी-कभी बात कर लेना, तुम्हारी आवाज़ सुन लेना भी मेरा नसीब नहीं हो सकता? तुम मुझे प्यार मत करो अब, मेरा साथ मत दो अब, मेरी हमदम मत बनो अब, मेरी हमसफ़र मत बनो अब लेकिन मैं तड़पता हूँ सिर्फ़ तुम्हें सुनने के लिए! तुम्हारी खुशी, तुम्हारा दुःख महसूस करने के लिए? मेरी तो हर खुशी और दुःख तुमसे ही बनती-बिगड़ती है। इसका तो कोई इलाज़ हो? ये लाइलाज सा होता जा रहा है? क्या तुम्हें कभी भी अब तक महसूस नहीं किया कि तुम मुझे अब बेज़ार कर रही हो? अगर तुम्हें मलाल हैं कई मेरी गलतियों की ख़ातिर, तो सुना दो फ़िर अपना फैसला आज ही अभी ही...मैं उफ़ तक नहीं करूंगा...मगर इस तरह कैसे जियूं मैं? ज़हाँ जीने जैसा कुछ नहीं है...सिर्फ़ सिसक है, तन्हाई है, दर्द की आहें हैं, और हर तरफ़ बेज़ारी!
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मैं चाहता हूँ कि अब ये हाले-दिल बदले
"सागर" ये ज़मी बदले या आसमाँ बदले

दर्द का हर मंज़र बदले, मैं बदलूँ तू बदले
फिज़ाओं का रंग बदले या ये हवा बदले

बदलना ज़रूरी है दर्द बदले या ख़ुशी बदले
अपने सबब पे वफ़ा बदले या बेवफ़ा बदले

अमित के सागर
[मौजे-सागार ब्लॉग से ]

संकल्प


और अंततः एक संकल्प हम सभी को अपने ह्रदय की सच्चाई और गहराईयों से लेना है । हम सब आतंकवाद के खिलाफ इस बड़ी लडाई में जाति मजहब पंथ की सरहदों से आगे बढ़कर एकजुट होकर एक ईकाई की तरह मिलकर लड़े । उल्टा तीर पत्रिका के इस अंक में आप सभी की सहभागिता रचनात्मक योगदान के लिए उल्टा तीर दिल से आप सभी का आभार व्यक्त करता है ।

उम्मीद है भविष्य में भी आप सभी का सहयोग और प्रेम हमें यूँही मिलता रहेगा । दरअसल अब ये वक्त आ गया है कि हम सभी अपनी सामाजिक राजनैतिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी निष्ठा से करे । दुष्यंत कुमार और अमिताभ की इन पंक्तियों के साथ हम अगले अंक तक आपसे अनुमति चाहते हैं ।

"कौन कहता है कि आसमाँ में सुराग नही हो सकता
एक
पत्थर तो तबियत से उछालो यारो "
[दुष्यंत कुमार]
एक लौ जला ले अपने भीतर
हर मुश्किल तितर बितर कर दे
नए दौर को लाने के लिए
आगे बढ़ हालात से लड़ ले
[अमिताभ]

मंगलवार, 23 सितंबर 2008

प्यार, पैसा, हिन्दी और चाँद का कुर्ता

[प्रणाम]

कैटरिना कैफ गेमा और हिन्दी कैटरीना कैफ को आप सब जानते हैं । गेमा को फिलहाल सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ। (इस लेख को पढने के बाद आप भी गेमा को जान जायेगें) आप सोच रहे होंगे दोनों का आपस में क्या वास्ता ? दरअसल, ये दोनों ही हिन्दी भाषा को शिद्दत से सीखना चाहती हैं । लेकिन दोनों के उद्देश्य अलग अलग हैं । मेरा मित्र जोगिन्दर पवार लन्दन में हैं । पिछले दिनों जोगिन्दर भारत आया हुआ था । जोगिन्दर की गर्ल फ्रेंड गेमा हिन्दी सीखना चाहती है । उसे हिन्दी सीखनी है क्योंकि उसका मानना है कि जब वो भारत में आए (दुल्हन बनकर ही) तो जोगिन्दर के परिजनों से हिन्दी में बात कर सके उन्हें उनकी भाषा में समझ सके। दरअसल, प्यार में अक्सर ऐसा ही होता है कि प्यार प्रेमी की भाषा से भी हो जाता है. ऐसा भी कहा जाता है यदि आप की दिलचस्पी किसी भाषा में अचानक बढ़ रही है तो कहीं न कहीं ये मामला प्यार का हो जाता है।

कैटरीना कैफ को हिन्दी सीखनी है क्योंकि वो हिन्दी फिल्मों में काम करती है. हिन्दी के बिना उसका गुज़ारा हिन्दी फिल्मों में लंबे अरसे तक हो नही सकता .कैटरीना ये बात अच्छी तरह जानती है , सो हिन्दी कैटरीना के मामले में पैसे की भाषा है। हिन्दी बाज़ार की भाषा बन रही है और हिन्दी प्यार की भाषा भी है। ब्लोगिंग में हिन्दी प्रेमी बढ़ चदकर अपना योगदान दे रहे है. न केवल देश में बल्कि विदेशों में बसे हिन्दी भाषी विविधता पूर्ण सौगात हिन्दी भाषा में दे रहे है । हिन्दी विज्ञापन, मीडिया ,सिनेमा इन्टरनेट हर तरफ धूम मचा रही है ।

लेकिन चाँद अपनी माँ से जिद कर रहा है उसे कुर्ता चाहिए .सर्दी उसे तंग करती है .रामधारी सिंह दिनकर की यही शैली उन्हें अलग करती है .छोटे प्रतीकों से बड़ी बात कहने की उनकी कला हमारे हिन्दी साहित्य की अनमोल सम्पदा है . उल्टा तीर पत्रिका "दिनकर "का यह अंक विश्व हिन्दी दिवस और दिनकर जन्म शती के अवसर पर आप सभी के लिए प्रस्तुत है …
लेखक का ब्लॉग:http://dilseamit.blogspot.com


बयार अब तक बाक़ी है!

उल्टा तीर पत्रिका दिनकर आप सभी सुधि पाठकों को साधुवाद के साथ अर्पित हैं। आप सभी का रचनात्मक सहयोग ही हमारी सच्ची ताक़त हैउल्टा तीर पत्रिका का यह दूसरा अंक हमारा छोटा सा प्रयास है उम्मीद कि आप सभी को यह प्रयास पसंद आएगा

आभार साहित
अमित के. सागर
उल्टा तीर



तुम लोग
उन लोगो को
अपने घर का दिया
अपनी बाती
किस ख़ुशी में देते हो
किस लालच में देते हो
और क्यों देते हो?

जिन लोगों की सामर्थ्य
एक पूरे गाँव को
एक पूरे शहर को
रौशन कर देने की है

मगर
वो
अँधेरा तारी होते ही
बंद कर लेते हैं
अपने घरों की खिड़कियाँ
अपने घरों के दरवाज़े
जिन्हें मतलब नहीं रहता
तुम्हारी अँधेरा तारी रातों से
तुम्हारी रातों के हादसों से

जिनसे मिलकर मगर
रौशन हो सकता है
सारा ज़हां

लेकिन ऐसा होता नहीं!
फ़िर क्यों नहीं
तुम लोग ही
निकल पड़ते
एकत्रित होके
मशाल बनके
अँधेरा तारी में
ख़ुद ही अपनी लौ को लेके
क्योंकि तुम्हारे अन्दर
सबको रौशन करने की
बयार अब तक बाकी है!

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