गुरुवार, 29 जनवरी 2009

आतंकवाद और हम भारत के लोग


[प्रणाम]

समूची दुनिया में हमारे मुल्क ने आतंक की भयावह त्रासदी को जितना अधिक झेला है , उतना शायद विश्व के किसी और देश ने इस पीड़ा को नही झेला है । आतंकवाद की समस्या समूची सभ्यता के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है । वास्तव में अब ये वक्त आ गया है कि समूची दुनिया सभ्यता के इस बड़े खतरे के खिलाफ एकजुट हो कर लड़े ।

दरअसल , आतंक की समस्या और इससे लड़ने में हमरे तंत्र को नए सिरे से तैयारी करनी होगी क्योंकि हमारी सभ्यता का यह शत्रु हमसे अधिक चालाक है हमें उससे अधिक चतुर और चालाक बनना होगा ।

पिछले दिनों में अपने गाँव में था । एक मेट्रो सिटी में रहते हुए आतंक का डर मुझे किस कदर सताता है? मेरे मित्र का सवाल था । उसका कहना था बेशक छोटे गाँव में ये हमले नही होते लेकिन कहीं न कहीं ये खतरा आतंक का भय गाँव में रहते हुए उनको भी उतना ही सताता है ।

यकीनन आतंक किसी भूगोल विशेष में नही पनपता है। आतंक का यह भय हमें भीतर तक उद्देव्लित कर रहा है ।
ज़रा याद कीजिए मुंबई पर आतंकी हमले के बाद ...आवाम का दर्द खुलकर उभर कर सामने आया । आम जनता का भरोसा तंत्र से उठा ?

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हमें अपनी लोकतात्रिक आस्था और विश्ववास को हर चुनौती में हर हाल में जिंदा रखना होगा । हमारे गणतंत्र का साठवे वर्ष में सफलता के साथ प्रवेश उप महाद्वीप में हमारी लोकतान्त्रिक आस्था और विश्वास का परिचय है । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में हम भारत के लोगो को जाना जाता है । इसलिए भी हमें आतंक को मुँहतोड़ जवाब देकर अपनी लोकतात्रिक आस्था मान्यताओ का सर हमेशा ऊंचा रखना होगा ।

कोई भी आतंकी इतना बड़ा नही जो हमें जीवन की जय बोलने से रोक सके
हमारा हौसला परस्पर विशवास ही हमारी असली ताक़त है , और अपने गणतंत्र को गुणी व्यवस्था का रूप देकर गुणतंत्र में बदलना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है । उल्टा तीर पत्रिका का यह अंक इसी भावना के साथ आप सभी को सादर अर्पित है।

14 टिप्पणियाँ:

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя 30 जनवरी 2009 को 1:53 am  

''आतंकवाद और हम'' एक सार्थक और सरह्यनीय पहल है ! बहुत खूब आपने इसे बहुत अच्छी तरह से सजाया है और मेरे लेख को शामिल करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

shama 30 जनवरी 2009 को 4:00 am  

Behad achha lekhan ho raha hai...har aatankee duniyaakaa sabse bada kayar hotaa hai...tabhee apnee baat bam aur bandookon kee aadse kehtaa hai...insaan kee bolee nahee boltaa.
Mai aabharee rahungi, gar mere likhe lekhko, "Meree Aawaaz Suno", ise shamil karen to...Tatha kavitayen " Ek Hindustaneekee Lalkaar, Phir Ek Baar"...
Dhanyawaad

Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" 2 फ़रवरी 2009 को 12:40 am  

isi tarah se sajakar jagane ke jarorat hai. likhte rahiye.

Babli 8 अप्रैल 2009 को 6:40 pm  

माफ़ कीजिएगा की मैने आपके एक ही ब्लोग पर अपना कमेन्ट दिया है!
बहुत बहुत शुक्रिया! आप ने बहुत ही खुबसूरत तरीके से लिखा है! मुझे आपका लेखन बेहद पसन्द आया!

TUMHARI KHOJ ME 18 अगस्त 2009 को 9:52 am  

जब तैमूरलंग, चंगेज खां और उन जैसे कितने लुटेरे और फिर अंग्रेज इस देश के जज्‍बे को खत्‍म नहीं कर सके तो यह मुठठी भर आंतकवादी किस खेत की मूली हैं?

Suman 18 अगस्त 2009 को 9:29 pm  

good

हेमन्त कुमार 19 सितंबर 2009 को 10:38 pm  

बहुत खूब । आभार ।

SACCHAI 22 सितंबर 2009 को 7:12 am  

" bahut khub likha hai aapne ....mai bhi yahi kaheta hu ..apane blog per ....kabhi aaye plz aur padhe mere blog per

" NAZOOK KALAI JAB UTHATI HAI BANDOOK "

AUR

" AATANKI KI GOLI PER KISKA NAAM LIKHA HAI "

aise bahut se lekh aapko milenge mere blog per .plz aayeyega jaroor "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogpost.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

प्रदीप कांत 19 अक्तूबर 2009 को 10:25 am  

Aatankvad ko khatm karane ke liye ho sakata hai garam hi nahin thande dimag se bhi sochana pade par yah tay hai ki koi bhi atankvad itana bada nahin ki bharateeya sabhyata ko khatm kar sake

SP Dubey 28 अक्तूबर 2009 को 8:09 am  

भले लोगो की देश (भारतीय समाज) में कमी नही है, पर कमी है तो उनके संगठित हो ने की, बिखरे हुए होने से कमजोर है। इसी का परिणाम है सभी प्रकार के आतंक का और इस के वाद का पोषण भी उन्ही "भले" लोगो के द्वारा हो रहा है जो वास्तव मे भले नही है परन्तु वेष भले लोगो क धारण किया हुआ है। जाग्रिति लने का कार्य निरन्तर कर ते रहना है

Mrs. Asha Joglekar 4 नवंबर 2009 को 4:18 pm  

बहुत अच्छा लिखा है आपने । आतंकवाद का सामना हमें अपने लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए करना तचाहिये पर व्यक्तिगत रूप से इसका सामना कैसे करें ये सवाल फिर बी रह जाता है ।

KAVITA RAWAT 20 नवंबर 2009 को 12:15 am  

Aapka lekh vartmaan aatanvaad jo ek badi chunouti ke roop mein hai usse nipatne ke liye aaj sabhi ko chhote-bade star par ekjut hokar ladni ki jarurat hai ...
Aapka chintan bhara aalekh bahut achha laga...
SHUBHKAMNA

अभिषेक प्रसाद 'अवि' 28 नवंबर 2009 को 5:50 am  

aatankvaad kee sabse badi jad hai humara ajagruk hona. humein ab jaagne kee jarorat hai. achhi koshish hai aapki.
samay mile to aaiyega. http://ab8oct.blogspot.com/
http://kucchbaat.blogspot.com/

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA 19 जून 2010 को 10:21 pm  

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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